सही समझ के लिए सत्ता से दो हाथ की दूरी जरूरी है। सत्ता आपकी आंखों पर परदा डाल देती है। ऐसा मतिअंध बना देती है कि आपको बस अपना ही अपना दिखता है, बदलता सच नहीं दिखता।और भीऔर भी

गुरु, किताब या ज्ञान के अन्य स्रोतों की भूमिका इतनी भर है कि वे हमारे मन-मस्तिष्क पर पड़े माया के परदे को हटा देते हैं। इसके बाद वास्तविक सच तक पहुंचने का संघर्ष हमें अकेले अपने दम पर करना पड़ता है।और भीऔर भी

देखती हैं आंखें, दिखाते हैं हम। माइक्रोस्कोप से देखा तो असंख्य  बैक्टीरिया नजर आ जाते हैं। टेलिस्कोप से देखा तो दृष्टि से ओझल सितारा दिख जाता है। असली सच नंगी आंखों से देखे गए सच से बहुत बड़ा होता है।और भीऔर भी

सच-झूठ के बीच कभी रहा होगा काले-सफेद या अंधेरे उजाले जैसा फासला। लेकिन अब यह फासला इतना कम हो गया है कि कच्ची निगाहें इसे पकड़ नहीं सकतीं। जौहरी की परख और नीर-क्षीर विवेक पाना जरूरी है।और भीऔर भी

धरती गोल है। लगती है चौरस। इस तीन आयामी दुनिया में सब कुछ ऐसा ही लगता है। लेकिन जो लगता है, वही सच नहीं होता। सच तक पहुंचने के लिए चौथी विमा या आयाम यानी समय को फ्रेम में लाना जरूरी है।और भीऔर भी

सत्य की जीत अपने आप नहीं होती। इसके लिए थोड़े झूठ, थोड़े छल का सहारा लेना पड़ता है। इसके लिए ‘नरो व कुंजरो व’ पर शंख बजाना, रथ से नीचे उतरे कर्ण से छल करना और विभीषण से भेद लेना जरूरी होता है।और भीऔर भी

समूची सृष्टि में हर चीज की दो गतियां होती हैं। एक अपनी धुरी पर और एक बाहर। अलग-अलग, लेकिन परस्पर जुड़ी। जो इन दोनों गतियों को साध लेता है, वही सफल साधक और सांसारिक है।और भीऔर भी

दुनिया में कुछ भी अकारण नहीं। सब नियमबद्ध है। नियम-विरुद्ध होने पर ही दुर्घटनाएं होती हैं। इसलिए इन नियमों को समझना जरूरी है और नियमों को तर्क पर तर्क, सवाल पर सवाल के बिना नहीं समझा जा सकता।और भीऔर भी