वी. अनंत नागेश्वरन ढाई साल से मौजूदा भारत सरकार या मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार है, भारत के नहीं। अगर भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार होते तो कभी ऐसी बात नहीं कहते कि, “भारत में सालाना एक लाख रुपए से कम कमानेवाले परिवारों के युवाओं की मानसिक सेहत बेहतर है जो नियमित व्यायाम करते हैं, परिवार में घनिष्ठता है और कभी-कभार ही अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, बनिस्बत उन युवाओं से जिनकी सालाना पारिवारिक आय 10 लाखऔरऔर भी

पिछले कई सालों से भारतीय निवेशकों के लिए बुलबुलों का दौर चल रहा है। पहले क्रिप्टो करेंसी। इसके बाद स्मॉल-कैप स्टॉक्स पर दांव लगाने का जुनून। फिर रेलवे से लेकर डिफेंस क्षेत्र तक की सरकारी कंपनियों ने गदर काटा। अब निवेशकों में आईपीओ का उन्माद। असल में जब भी शेयर बाज़ार तेज़ी पर होता है तो माहौल को भुनाने के लिए कंपनियां चीलों और मर्चेंट बैंकर उनके सेनानी कौओं की तरह नादान निवेशकों के झुंड पर टूटऔरऔर भी

हेल्थकेयर को कभी भी बाज़ार शक्तियों के हवाले नहीं किया जा सकता क्योंकि वो बाजार के नियमों से नहीं चलता। उसमें अनिश्चितता व विपत्ति के पहलू हैं। उसे हमदर्दी व सम्वेदना के बिना कतई नहीं चलाया जा सकता। यह भी गौरतलब है कि भारत में हेल्थकेयर एक ऐसा क्षेत्र है जहां रेग्युलेशन न के बराबर है। कोई भी कहीं भी अस्पताल या नर्सिंग होम खोल सकता है और किसी की कोई जवाबदेही नहीं। यही वजह है किऔरऔर भी

अपने देश में टैक्स का धन यूनिवर्सल हेल्थकेयर की पब्लिक फंडिंग में नहीं, बल्कि निजी बीमा कंपनियों और अस्पतालों का धंधा बढ़ाने में जा रहा है। सभी मानते ज़रूर हैं कि हेल्थकेयर की सुविधाएं देना सरकार का काम है और निजी क्षेत्र से इसकी उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन यह भी तो सच है कि प्राइवेट हेल्थकेयर क्षेत्र को सरकार ने ज़मीन से लेकर टैक्स जैसी तमाम सुविधाओं में भारी सब्सिडी दे रखी है। इससे हुआ यहऔरऔर भी

आज़ादी के समय से ही देश में यूनिवर्सल हेल्थकेयर का ख्वाब देखा गया। लेकिन 77 साल बाद भी हर तरफ स्वास्थ्य सेवाओं का अकाल है। अब दावा किया जा रहा है कि 2030 तक देश में सबको यूनिवर्सल हेल्थकेयर उपलब्ध कराने का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा और 70 साल से ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों को आयुष्मान योजना के तहत लाना इसी लक्ष्य की तरफ बढ़ा कदम है। लेकिन केवल स्वास्थ्य बीमा से क्या होगा? क्या इससेऔरऔर भी

सत्तर साल या इससे ऊपर के सभी वरिष्ठ नागरिकों को आयुष्मान योजना में लाने स्कीम घोषित करते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा था, “इस स्कीम का शुरुआती खर्च ₹3437 करोड़ है। चूंकि यह मांग आधारित स्कीम है तो जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी, इसका कवरेज बढ़ा दिया जाएगा।” लेकिन वैष्णव का ये बयान पब्लिक को गुमराह करनेवाला है क्योंकि यह स्कीम मनरेगा की तरह मांग आधारित नहीं है। इसमें सरकार बीमा कंपनियों को प्रीमियम देती है जिसकेऔरऔर भी

बीते हफ्ते 11 सितंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में 70 साल या इससे ऊपर के सभी लोगों को सालाना पांच लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा कवर उपलब्ध कराने की स्कीम को मंजूरी दे दी। यह साल 2018 से ही गरीबों के लिए चल रही आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का विस्तार है जिसमें 13.44 करोड़ परिवारों के करीब 65 करोड़ लाभार्थियों को कवर किया जा रहा है। लेकिन इसके विस्तार में शामिल वरिष्ठ नागरिकों परऔरऔर भी

शेयर बाज़ार सरपट दौड़ रहा है। अच्छी कंपनियों के शेयर पहुंच के बाहर। फिर भी निवेशक खरीदे जा रहे हैं। उन्हें डर है कि कहीं वे तेज़ी के इस दौर से बाहर न रह जाएं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भी इधर जमकर खरीदने लगे हैं। एक बात तो तय है कि शेयरों के भाव अंततः उनके पीछे उमड़े धन के प्रवाह से निर्धारित होते हैं। लेकिन लोगबाग तो वही शेयर खरीदते हैं जिनका बढ़ना लगभग तय होताऔरऔर भी

जीडीपी के साथ डिफ्लेटर की तिकड़मबाजी करने के बावजूद मोदीराज में भारत ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका) ही नहीं, जी-20 देशों में प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे गरीब है। मालूम हो कि जी-20 के बाकी देश जीडीपी की गणना में डबल डिफ्लेटर की पद्धति अपनाते हैं। वे आउटपुट डिफ्लेटर लगाकर रीयल आउटपुट और इनपुट डिफ्लेटर लगाकर रीयल इनपुट निकालते हैं। फिर रीयल इनपुट को रीयल आउटपुट से घटाकर रीयल जीडीपी निकालते हैं।औरऔर भी

दुनिया भर के तमाम विकसित और विकासशील देश असली जीडीपी निकालने के लिए डिफ्लेटर का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन भारत इकलौता देश है जहां डिफ्लेटर का चोंगा पहनाकर भयंकर छल किया जा रहा है और सच छिपाया जा रहा है। अमेरिका समेत तमाम विकसित देश डिफ्लेटर के तौर पर प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) का उपयोग करते हैं। यही स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय मानक भी है। भारत डिफ्लेटर के रूप में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) का उपयोग करता है। दिक्कतऔरऔर भी