वित्तीय बाज़ार में घातक धारणा फैली हुई है कि भाव ही भगवान है। कुछ लोग सारी टेक्निकल एनालिसिस को छोड़कर दावा करते हैं कि केवल भावों के आधार पर बाज़ार को पकड़ा जा सकता है। लोगों को लगता है कि वाह! कितना आसान है। खाली भाव देखना सीख लो तो कमाई ही कमाई होने लगेगी। वे सीखने के चक्कर में दस-बीस हज़ार गंवा देते हैं। लेकिन कमाई में ठन-ठन गोपाल बने रहते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

युद्ध के मैदान में कोई सोचे कि हम ही हम हैं, दूसरा नहीं तो पलक झपकते ही कोई उसे खत्म कर सकता है। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में अक्सर छोटे ही नहीं, बड़े शहरों के सामान्य लोग इसी अहंकार के साथ उतरते हैं। उनको लगता है कि उन्होंने जैसा सोचा है, वैसा ही होगा। पहले छोटा घाटा, उसे निकालने के चक्कर में बड़ा घाटा और फिर खल्लास। आखिरकार, मामू वापस दुकान पर। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

कंपनियों के सालाना नतीजों का मौसम है। अधिकांश लोग मानते हैं कि नतीजे अच्छे होंगे तो शेयर चढ़ेंगे और खराब होंगे तो गिरेंगे। लेकिन अक्सर बाज़ार में ऐसा होता नहीं। खराब नतीजों पर भी कंपनी के शेयर उछल जाते हैं और अच्छे नतीजों पर भी लुढ़क जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शेयरों के भाव नतीजों या खबरों पर नहीं, बल्कि उन पर ट्रेडर क्या प्रतिक्रिया दिखाते हैं, इससे तय होते हैं। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दस साल पहले घी का दाम 120 रुपए/किलो, सोने का दाम 8500 रुपए/दस ग्राम और सेंसेक्स 12,000 अंक पर था। इस समय घी 450 रुपए, सोना 30,000 रुपए और सेंसेक्स 25,225 पर है। इस तरह इन दस सालों में घी 275%, सोना 253% और सेंसेक्स 113% बढ़ा है। सेंसेक्स का इन तीनों में सबसे कम बढ़ना दिखाता है कि अर्थव्यवस्था में दौलत का सृजन नहीं हो रहा है। तथास्तु में आज की कंपनी दौलत बनाने के लिए…औरऔर भी

निवेश या ट्रेडिंग के लिए कंपनी चुनना बहुत मुश्किल नहीं। रिस्क संभालने की कला सीखना भी कोई खास मुश्किल नहीं। लेकिन इसके लिए हमें अपनी सामान्य सोच व आदतों पर अंकुश लगाना पड़ता है। शेयर बाज़ार में रिस्क संभालने का मोटे तौर पर मतलब है ज्यादा गिरावट से बचना। अगर हम मूविंग औसत व टाइम फ्रेम को ध्यान में रखने लगें और बाज़ार की चलाएं तो अधिक चोट खाने से बच सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बचत को अलग-अलग आस्तियों में लगाने को पोर्टफोलियो प्रबंधन भी कहा जाता है। आम लोग ज्यादातर निवेश बैंक एफडी, सोने या रियल एस्टेट में करते हैं। बाकी आस्तियों में निवेश इसलिए नहीं करते क्योंकि वहां मूलधन ही डूबने का रिस्क होता है। लेकिन लंबे समय में सबसे ज्यादा रिटर्न शेयरों में निवेश से मिलता है। ट्रेडिंग में भी हलचल अधिक होने से कमा सकते हैं। मगर, इसके लिए रिस्क संभालना मूल शर्त है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हकीकत में हमें किसी विशेषज्ञ सलाह या ब्रोकर के एसएमएस की ज़रूरत नहीं होती। मेहनत व अनुशासन की राह पर चलें तो हम अपना निवेश खुद संभाल सकते हैं। यहां तक कि ट्रेडिंग में भी अभ्यास से नियमित कमाई कर सकते हैं। इसके लिए हमें तीन खास बातों का ध्यान रखना होता होता है। ये हैं: बचत को अलग-अलग आस्तियों में सही अनुपात में लगाना, रिस्क संभालना और सही कंपनी का चयन। अब लगाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

पहले अनाप-शनाप नाम से एसएमएस भेजकर उल्लू बनाते थे। अब ब्रोकर हाउसेज़ के नाम पर झांसा दिया जा रहा है। जनवरी में मेरे पास निर्मल बंग सिक्यूरिटीज़ के नाम से एसएमएस आया कि संग फ्रोइड लैब्स में खरीद रिपोर्ट आनेवाली है। कंपनी को अमेरिका में राइटेन सिरप बेचने की अनुमति मिल गई है। बिक्री 400% बढ़ेगी। शेयर 22 पर है। 50 तक जाएगा। फौरन खरीद लें। वो शेयर अभी 5.87 रुपए पर है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

एक्सपर्ट के नाम पर उल्लू बनाने का धंधा खूब चला हुआ है। विज्ञान में विशेषज्ञों की राय की अहमियत ज़रूरत होती है। यह बात अलग है कि मेडिसिन और रसायन शास्त्र तक में नोबेल पुरस्कार विजेता गलत साबित हो चुके हैं। इसलिए कम से कम फाइनेंस में विशेषज्ञों की कतई नहीं सुननी चाहिए क्योंकि वे निष्पक्ष विश्लेषक नहीं, बल्कि खुद धंधे में लिप्त लोग हैं और तथ्यों पर नहीं, स्वार्थों पर चलते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सभी जानते हैं कि शेयरों में निवेश रिस्की है क्योंकि पता नहीं कि भविष्य में क्या हो जाए। अनिश्चितता को मिटाना कतई संभव नहीं। लेकिन रिस्क से बचने के लिए अनिश्चितता से भाग भी नहीं सकते। फिर करें तो क्या करें? यहां यह समझ बड़े काम की हो सकती है कि रिस्क वो अनिश्चितता है जिसे मापा जा सकता है और अनिश्चितता वो रिस्क है जिसे मापना संभव नहीं। अब तथास्तु में प्रस्तुत है आज की कंपनी…औरऔर भी