इस समय भारत के शेयर बाज़ार में लगभग एक-तिहाई ट्रेडिंग अल्गोरिदम या नियमों से बंधे कंप्यूटर प्रोग्राम से हो रही है। अमेरिका में यह अनुपात 85% से ज्यादा है। भारत में भी आज नहीं तो कल यही हाल होना है। लेकिन क्या मशीन से होनेवाली ट्रेडिंग अंततः इंसान को मात दे सकती है? अगर आपको इसका जवाब ‘हां’ लगता है तो आप गलत हैं क्योंकि मशीन इंसान के स्वभाव को नहीं समझ सकती। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जो कंपनियां विदेशी बाज़ार पर निर्भर हैं, उनके लिए देश का सूखा खास मायने नहीं रखता। मगर, जो कंपनियां घरेलू बाज़ार पर निर्भर हैं, उनके लिए मानसून का खराब रहना बहुत मायने रखता है। गांवों और खेती-किसानी की हालत खराब होने से बिक्री से लेकर उनके मुनाफे तक को चोट लगती है। लेकिन आशा है कि दो साल बाद इस बार मानसून औसत से बेहतर रहेगा। तथास्तु में आज ऐसी कंपनी, मानसून जिसे गर्दिश से निकाल देगा…औरऔर भी

ट्रेडिंग में भावना या मन के निषेध के लिए पहले हमें अपने मनोविज्ञान को समझना होगा। जैसे, हाथ में आया मुनाफा हम जाने नहीं देना चाहते। मानने को तैयार नहीं होते कि हमारा कोई फैसला घाटा बढ़ाने का सबब बन जाएगा। स्टॉप-लॉस को ऊपर उठाने के बजाय बीच में ही मुनाफा काट लेते हैं। वहीं, उल्टे पड़े सौदे में स्टॉप-लॉस गिराते जाते हैं और घाटे के दलदल में समूची पूंजी डुबा डालते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जिस किसी को शेयर या अन्य वित्तीय बाज़ारों में ट्रेडिंग से कमाना है, उसे ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए, बहुत सारे कारकों के मद्देनज़र ऐसी व्यूह-रचना करनी होगी कि मन लाख कोशिशों के बावजूद उसमें घुस ही न पाए। पक्का समझिए कि मन उसमें घुस गया तो सारा खेल भरभंड कर देगा और आप हार जाएंगे। सिस्टम में क्या नियम रखे जाने हैं, इसके किताबों के साथ ही अपने अनुभव से सीखना होता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

समग्र आकलन जितना वस्तुगत व निरपेक्ष होगा, उतनी ही अधिक उसके सही बैठने की प्रायिकता होती है। यह प्रायिकता 70-80% हो तो क्या कहने! लेकिन प्रायः हम कभी वस्तुगत आकलन कर ही नहीं पाते हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि सारे कारकों का पता-ठिकाना हमें मालूम नहीं होता। दूसरे, आकलन में हम आत्मगत पहलू या अपने मन की बात घुसेड़ देते हैं। ऐसे में प्रायिकता में बट्टा लग जाता है। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में पक्का कुछ नहीं होता। फिर भी राह निकालने के लिए अपनी तरफ से मशक्कत करनी पड़ती है। रात बीतने ही पिछले भाव अतीत बन जाते हैं। इसके बावजूद ट्रेडर उनके पैटर्न से आगे का अनुमान लगाते हैं। यह अनुमान गणित व सांख्यिकी के मेल से भी निकाला जा सकता है और भावों के चार्ट पर बनती आकृतियों से भी। जिसको जो भाए, उसको उस तरीके से भावी आकलन करना होता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार की अगली चाल कौन-सी चीज़ें तय करती हैं? उसमें जितने भी लोग सक्रिय हैं चाहे वो देशी या विदेशी संस्थाएं हों या एचएनआई निवेशक और भेड़चाल चलते रिटेल निवेशक, इन में सभी की हरेक हरकत का मेल। इसके ऊपर इन लाखों शक्तियों के भिन्न क्रम और मेल का असर। जैसे, लाखों वनस्पतियां जंगल के स्वभाव का निर्धारण करती हैं। फिर भी हम जंगल से पार पाने की जुगत निकालते हैं। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

80-85% भारतीयों के पास ज़रूरी खर्चों को पूरा करने के बाद इतना नहीं बचता कि भविष्य के लिए अलग से बचा सकें। इसीलिए बीमा व पेंशन जैसी सरकारी स्कीमों के ज़रिए सामाजिक सुरक्षा की बड़ी ज़रूरत है। फिर भी निवेश की इस धारणा पर हमें सोचना चाहिए कि खर्च के बाद जो बचे, उसे बचाने के बजाय, बचाने के बाद जो बचे, उसे ही खर्च करना चाहिए। अब तथास्तु में बचत को दौलत बना सकनेवाली एक कंपनी…औरऔर भी

बहुतेरे ट्रेडर अफसोस करते हैं कि उतने भाव पर खरीदा या बेचा होता तो फायदे में रहता। इसी सोच में दिवास्वप्न देखते रहते हैं। भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग से कमाई का असली सूत्र सही एंट्री या निकलने के बजाय सौदे का सही आकार है। सौदे का आकार इतना हो कि उसके उल्टा पड़ने की बेचैनी दिन-रात न सताए। एक सौदा ज्यादा से ज्यादा 0.5-1% ट्रेडिंग पूंजी ही डुबाए। बाकी तो प्रायिकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार को पकड़ना किसी के लिए संभव नहीं। अकेले भावों से उसकी थाह लगाना तो एकदम मुमकिन नहीं क्योंकि भाव तो छाया हैं और छाया से काया को नहीं पकड़ा जा सकता। असल में भाव बहुत सारे कारकों से मिलकर बनते हैं। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए उनकी भावी चाल का अंदाज़ भर लगाया जा सकता है। यहां पक्का कुछ नहीं, केवल प्रायिकता या संभावना ही निकाली जा सकती है। अब पकड़ें गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी