शेयर बाज़ार देश में कोरोना की दूसरी लहर को न जाने कब जज्ब करना शुरू करेगा! लेकिन रेटिंग एजेंसियों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके ऋणात्मक असर का आकलन शुरू कर दिया है। इंडिया रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष 2021-22 में हमारे जीडीपी की वास्तविक विकास दर का अनुमान 10.4% से घटाकर अब 10.1% कर दिया है। अभी तक के हिसाब-किताब के मुताबिक बीते वित्त वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ने के बजाय 7.6% घटी है। इसलिएऔरऔर भी

कोरोना वायरस ने साल भर से हड़कम्प मचा रखा है। लेकिन बहुत हुआ तो वायरस कई म्यूटैंट बनाने के बावजूद साल-दो साल में खत्म हो जाएगा। नाकारा व संवेदनहीन सरकार हुई तो देश में ज्यादा लोग, ज्यादा तकलीफ से मरेंगे और अर्थव्यवस्था को ज्यादा चोट लगेगी। वहीं, अच्छी व संवेदनशील सरकार हुई तो कम लोग कम तकलीफ से मरेंगे और अर्थव्यवस्था को कम चोट पहुंचेगी। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटेगी। अच्छीऔरऔर भी

तय मानकर चलें कि भारतीय शेयर बाज़ार का गुब्बारा किसी देशी घटनाक्रम से नहीं फूटेगा। ग्लोबल हो चुके बाज़ार में इसका स्रोत बाहरी होगा। अंदर तो हमारे समूचे तंत्र की इलास्टिक खींच-खींचकर इतनी ढीली कर दी गई है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ घनघोर भ्रष्टाचार का महाभियोग भी खिसककर नीचे गिए जाएगा। बाहर से बाज़ार को जोर का झटका भयंकर उधारी का तंत्र टूटने पर लग सकता है। इस समय हालत यह है कि एक डॉलर लगाकर 500औरऔर भी

आर्थिक गतिविधियां कोरोना संकट से पहलेवाली स्थिति में कब लौटेंगी, नहीं पाता। हालांकि शेयर बाज़ार अब भी मानकर बैठा है कि सब ठीक होने जा रहा है। सवाल उठता है कि बाज़ार की तेज़ी सस्ते धन के प्रवाह और सटोरिया पूंजी की चहक के दम पर आई है या किसी ठोस आशावाद की बदौलत? ऊपर-ऊपर सब सुनहरा है। कोरोना से निपटने के वैश्विक वित्तीय पैकेज का धन भी भारत, चीन व इंडोनिशिया के बाज़ारों की तरफ बहऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था के उबरने की कोई सूरत नहीं दिख रही। लेकिन शेयर बाज़ार का मूल्यांकन किसी दम्भी राजा के गुमान की तरह फूले जा रहा है। आखिर कब उसका गुमान टूटेगा, गुब्बारा फूटेगा? लॉकडाउन में घर-बैठे लोग साल भर से बाज़ार में कूदते रहे हैं और फिर कूदने को तत्पर हैं। देश 1992 से लेकर 2008 तक हर्षद मेहता व केतन पारिख से लेकर हेजफंड और सब-प्राइम संकट से निकले भूचाल देख चुका है। लेकिन इस बार कबऔरऔर भी

हम सामाजिक ही नहीं, आर्थिक व वित्तीय जीवन के बड़े विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं। विश्व अर्थव्यवस्था लस्त-पस्त है। सस्ती ब्याज दरों की चादर के नीचे मुद्रास्फीति का अजगर कुलकुला रहा है। आर्थिक विषमता सामाजिक अशांति का बारूद सुलगाए पड़ी है। कोरोना की दूसरी लहर ने बनती संभावनाओं के सारे समीकरण तोड़ डाले हैं। देश के भीतर अंधेर नगरी, चौपट राजा का हाल है। यहां कोरोना वैक्सीन की किल्लत है, लेकिन सत्ताशीर्ष पर बैठे लोग नऔरऔर भी

जिन्होंने शेयर बाज़ार में पांच-दस साल के लिए धन लगाया है, उन्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं। लेकिन जो खटाखट मुनाफा बटारने के लिए बाज़ार में कूदे हैं, उन्हें फिलहाल झटपट निकल लेना चाहिए। दरअसल, अपने शेयर बाज़ार का गुब्बारा इतना फूल चुका है कि कभी भी फट सकता है। अर्थव्यवस्था रसातल तो शेयर बाज़ार सातवें आसमान पर! इसमें भी जबरन चढ़ाई गई बर्जर किंग इंडिया, अडानी ग्रीन एनर्जी और रामदेव की 15 कटोरी दाल, 17 गिलासऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की गली भयंकर रिस्क से भरी है। इस हकीकत को कभी नकारना नहीं चाहिए। यहां एक डिग्री ज्यादा रिस्क तभी लें, जब कम के कम दो डिग्री रिवॉर्ड मिलने की संभावना हो। जानकार मानते हैं कि मौजूदा स्थिति में बाज़ार में कोई गुब्बारा नहीं है। बहुत हुआ तो सेंसेक्स और निफ्टी 20% तक गिर सकते हैं। लेकिन इसे करेक्शन कहा जाएगा। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद जिस तरह अमेरिका से लेकर यूरोप वऔरऔर भी

हमेशा याद रखें। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग ‘ज़ीरो-सम गेम’ है। किसी का नुकसान, दूसरे का फायदा। यहां पक्का कुछ नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्रायिकता चलती है। लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। मोटा-सा नियम कि जिस स्टॉक को खरीदने की आतुरता ज्यादा, वो बढ़ेगा और जिसे बेचने की व्यग्रता ज्यादा, वो गिरेगा। यह भी ध्यान रहे कि देशी-विदेशी संस्थाओं की खरीद या बिकवाली से ही शेयरों के भाव पर असर पड़ता है। प्रोफेशनल ट्रेडर यही पकड़नेऔरऔर भी

करीब डेढ़ महीने से शेयर बाज़ार पर छाया उन्माद थमता दिख रहा है। 16 फरवरी को निफ्टी ने 15,431.75 का शिखर पकड़ा था। तब से उसकी हालत लस्टम-पस्टम है। कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने मुनाफावसूली बाज़ार को दबा ले जाती है। सुबह खरीदकर उसी शाम या अगली शाम बेचकर मुनाफा कमा लेने की अंधी चाल गच्चा देने लगी है। अब तेज़ी के उन्माद में बाज़ार के कूदे नए-नवेले ट्रेडरों को सोचना पड़ रहा है। क्याऔरऔर भी