झटके छोटे-छोटे, तगड़े झटके के आसार नहीं!

अर्थव्यवस्था के उबरने की कोई सूरत नहीं दिख रही। लेकिन शेयर बाज़ार का मूल्यांकन किसी दम्भी राजा के गुमान की तरह फूले जा रहा है। आखिर कब उसका गुमान टूटेगा, गुब्बारा फूटेगा? लॉकडाउन में घर-बैठे लोग साल भर से बाज़ार में कूदते रहे हैं और फिर कूदने को तत्पर हैं। देश 1992 से लेकर 2008 तक हर्षद मेहता व केतन पारिख से लेकर हेजफंड और सब-प्राइम संकट से निकले भूचाल देख चुका है। लेकिन इस बार कब धमाका होगा, किसी को नहीं पता। जानकार कहते हैं कि बाज़ार इसी तरह साल-डेढ़ साल चढ़ता-उतरता रह सकता है। अब मंगलवार की दृष्टि…

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