हर कोई अक्सर अपने कर्मं की सार्थकता के बारे में सोचता है। मैं भी कभी-कभी सोचता हूं कि जो काम कर रहा हूं, उसकी सार्थकता क्या है। नोट बनाने का लालच तो सब में है। लेकिन इस देश में बचानेवाले कितने हैं और इन बचानेवालों में भी अपने धन को जोखिम में डालने की जुर्रत कितने लोग कर सकते हैं? फिर आखिर मैं किसकी सेवा में लगा हूं? इन लोगों की हालत तो वही है कि गंजेड़ीऔरऔर भी

जैन इरिगेशन सिस्टम्स ड्रिप व स्प्रिंकल सिंचाई उपकरणों के अलावा पीवीसी, पोलि इथिलीन व पॉलि प्रोपिलीन पाइप सिस्टम, प्लास्टिक शीट, डिहाइड्रेटेड प्याज व सब्जियां, टिश्यू कल्चर, बायो फर्टिलाइजर, सोलर वॉटर हीटिंग सिस्टम और सोलर फोटो वोल्टिक उपकरण भी बनाती है। वह फसलों के चयन से लेकर बंजर व असिंचित भूमि के समुचित उपयोग से जुड़ी सलाहकार सेवाएं भी देती है। राजस्थान से निकलकर महाराष्ट्र के जलगांव में बसे जैन परिवार ने व्यापार से शुरू कर ईंट-दर-ईंट इसऔरऔर भी

ऑप्टो सर्किट्स भांति-भांति के मेडिकल उपकरण बनाती है। ईसीजी से लेकर दिल के स्टेंट तक। 1992 में बनी बेंगालुरू की कंपनी है। लेकिन अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, रूस व चीन समेत दुनिया के 150 से ज्यादा देशों में अपने उत्पाद बेचती है। अमेरिका की औषधि नियामक संस्था, यूएसएफडीए की सूची में है। कंपनी के पास फिलहाल 168 पेटेंट हैं, जबकि 53 पेटेंट विचाराधीन हैं। पिछले तीन सालों में उसकी बिक्री 50.18 फीसदी और लाभ 39.43 फीसदीऔरऔर भी

बीएसई में कल कुल 2950 प्रपत्रों या स्क्रिप्स में ट्रेडिंग हुई। इनमें से चार ने अब तक का ऐतिहासिक उच्चतम स्तर हासिल कर लिया। ये हैं – तिलक फाइनेंस, कृष्णा वेंचर्स, इंडियन ब्राइट और सुलभ इंजीनियर्स। ये चारों ही टी ग्रुप की कंपनियां हैं जिनमें कोई सट्टेबाजी नहीं चलती और 100 फीसदी डिलीवरी लेना जरूरी है। दूसरी तरफ कल 175 कंपनियों के शेयर अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए। इससे एक इशारा तो यहऔरऔर भी

बामर लॉरी तेल व प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन काम करनेवाली सरकारी कंपनी है। हालांकि सरकार का निवेश इसमें प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से है और उसे इसकी प्रवर्तक नहीं माना जाता। 1972 से भारत सरकार इसकी मालिक बनी है। अंग्रेजों के जमाने की कंपनी है। 1 फरवरी 1867 को शुरुआत कोलकाता में पार्टनरशिप फर्म के रूप में हुई। शुरुआती सालों में वो चाय लेकर शिपिंग, बीमा से लेकर बैंकिंग और ट्रेडिंग से लेकर मैन्यूफैक्चिरंग तकऔरऔर भी

इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं और जो नतीजा निकला वो न बहुत ज्यादा रहा और न ही बहुत कम। रिजर्व बैंक ने मार्च 2010 से ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला रोक दिया है। उसने अपेक्षा के मुताबिक रेपो दर को 8.5 फीसदी पर यथावत रखा है। इसके अनुरूप रिवर्स रेपो दर भी 7.5 फीसदी पर अपरिवर्तित रही है। शेयर बाजार ने रिजर्व बैंक के इस रुख का स्वागत किया और सेंसेक्स व निफ्टी दोनों में करीब डेढ़औरऔर भी

वयस्क मताधिकार में हर 18 साल के नागरिक को वोट देने का हक है। उसी तरह कंपनियों के शेयरधारकों को कंपनियों के फैसलों में वोट देने का हक होता है। फर्क इतना है कि यहां शेयरों की खास श्रेणियों में मताधिकार की स्थिति बदलती रहती है। प्रेफरेंशियल शेयर का नाम आप लोगों ने सुना ही होगा। एक अन्य तरह के शेयर होते हैं डीवीआर (डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स) शेयर। आम शेयरों में तो हर शेयर पर एक वोटऔरऔर भी

गिरे हुए बाजार में भी महंगे शेयर हो सकते हैं और चढ़े बाजार में भी सस्ते। हम बाजार का रुझान निफ्टी और सेंसेक्स से नापते हैं। लेकिन सेंसेक्स के 30 निफ्टी के 50 में शामिल हैं तो दोनों सूचकांकों में कुल मिलाकर 50 शेयर ही हुए। जबकि बाजार में लिस्टेड कुल लिस्टेड कंपनियों की संख्या इस समय 5105 है जिनकी कुल 8536 स्क्रिप्स (प्रपत्र या प्रतिभूतियां) लिस्टेड हैं। टाटा मोटर्स जैसी कई कंपनियों के शेयर, डीवीआर (डिफरेंशियलऔरऔर भी

विज्ञापन लोगों के मासूम मन को छलनेवाला ऐसा करतब है जिस पर नियामक बैठाने की बात तो बार-बार हुई है, लेकिन अभी तक कंपनियों व विज्ञापन जगत के नुमाइंदों से बने संगठन एएससीआई (एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया) को पंच बनाकर रखा हुआ है जिसकी कमान एक क्लर्कनुमा सज्जन, एलन कोल्लाको को सालोंसाल से सौंप रखी है। यह तो वही बात हुई कि ठगों को ही ठगी को रोकने का थानेदार बना दिया। इसीलिए अक्सर लगता हैऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के एक अधिकारी को खूस देकर फर्जी चिट्ठी बनवाने से लेकर मनी लॉन्डरिंग व शेयर बाजार में धांधली करने जैसे अपराधों का दोषी स्टॉक ब्रोकर निर्मल कोटेचा फरार हो गया है। वह भी तब, जब सेबी और रिजर्व बैंक जैसे नियामक ही नहीं आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, आईबी और सीबीआई जैसी एजेंसियां उस पर गिद्ध निगाह रखे हुए थीं। कोटेचा ने तीन साल पहले पिरामिड साइमीरा के शेयरों को जबरन चढाने केऔरऔर भी