चुनावों में जमकर धन बहता है। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकती, लेकिन माना जाता है कि एफपीआई या एफआईआई के माध्यम से भी इस दौरान राजनीतिक जोड़तोड़ में लगे भारतीय व्यापारियों व उद्योगपतियों का धन बाहर भेजकर वापस लाया जाता है। यूं तो चुनावों में काले-सफेद धन का भेद मिट जाता है। फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस दौरान कालेधन की वैतरिणी ज़ोर-शोर से बहती है। भरपूर विज्ञापन दिखाए और छापे जातेऔरऔर भी

हिमाचल प्रदेश का चुनाव हो गया। गुजरात विधानसभा चुनाव कुछ हफ्तों में होना है। अगले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक व तेलंगाना से लेकर त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम व नगालैंड तक के विधानसभा चुनाव होने हैं। उसके बाद तो 2024 के लोकसभा चुनावों का हंगामा शुरू हो जाएगा। हर सरकार व राजनीतिक दल चुनावी मूड में आ चुके हैं। ओडिशा जैसा राज्य जहां की विधानसभा का चुनाव 2024 में लोकसभा चुनावों के बाद होना है, उसकी भीऔरऔर भी

राजनीति और अर्थनीति का सीधा रिश्ता है क्योंकि राजनीति से ही सरकारें बनती हैं जो आर्थिक नीतियों का फैसला करती हैं जिनसे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से लेकर कॉरपोरेट जगत तक संचालित होता है। कॉरपोरेट जगत पर असर से शेयर बाज़ार सीधा-सीधा प्रभावित होता है। सरकार कौन-सी बनेगी, यह लोकतंत्र के मौजूदा दौर में चुनावों से तय होता है। इस तरह कड़ी से कड़ी जोड़कर देखें तो चुनावों से शेयर बाज़ार का सीधा रिश्ता बनता है। कैसे? यह साबितऔरऔर भी

भारत में ट्रेडिंग और लम्बे निवेश का सही संतुलन ही शेयर बाज़ार से कमाने का सबसे सुसंगत व कारगर तरीका है। यह कोई बुरी बात नहीं है कि कंपनी का शेयर दो-चार दिन या तीन-चार हफ्ते में न बढ़े तो उसमें की गई ट्रेडिंग को लम्बे समय का निवेश बना लिया जाए और चार-पांच साल के लिए किया गया निवेश अगर कुछ हफ्तों या महीनों में ही लक्ष्य भेद दे तो ट्रेडर की तरह उसे बेचकर मुनाफाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हम-आप जैसे लोगों के लिए लम्बे समय का निवेश एक तरह की ट्रेडिंग है क्योंकि आप वॉरेन बफेट या राकेश झुनझुनवाला की तरह किसी कंपनी का मालिकाना लेने या उसके प्रबंधन में शामिल तो नहीं हो जा रहे। निवेश कुछ साल के बाद बेचेंगे नहीं तो फायदा कैसे होगा! इसलिए लम्बा निवेश भी ट्रेडिंग है। दूसरी तरफ ट्रेडिंग भी छोटे समय का निवेश है। इंट्रा-डे ट्रेडिंग एक दिन के लिए, स्विंग व मोमेंटम ट्रेडिंगऔरऔर भी

कुछ लोग शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से इसलिए घबराते हैं कि इससे होनेवाली आय को बिजनेस आय माना जाएगा और उन्हें ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा। वे यह नहीं समझते कि वे अपनी जेब से नहीं, बल्कि अपनी कमाई पर टैक्स दे रहे हैं। कमाया तभी तो उसका एक हिस्सा टैक्स के रूप में चुकाया। नहीं कमाते तो कहां से टैक्स देते! कहने का सार यह है कि पहले कमाने की सोचें। टैक्स देने के भय से कमानेऔरऔर भी

डिमांड ज़ोन के आसपास खरीदो और सप्लाई ज़ोन की रेंज में पहुंचते ही बेचकर मुनाफा कमा लो। खरीदने और बेचने का दरमियानी फासला कुछ दिन से लेकर एकाध महीने से ज्यादा का भी हो सकता है। लेकिन किसी भी हालत में ट्रेडिंग या कहें तो अल्पकालिक निवेश की अवधि 90 दिन या तीन महीने से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। नहीं तो आप फंस जाओगे तो कई सालों में बहुत हुआ तो अपनी बचत को मुद्रास्फीति के असरऔरऔर भी

शेयर बाजार से कमाने का क्या है मध्यमार्ग? बाज़ार की ज़मीनी हकीकत से जुड़े लोग बताते हैं कि यहां से वही कमाता है, जो नियमित बेचता रहता है। ज्यादा से ज्यादा 90 दिन में बेचकर निकल लो और फायदा कमा लो। कोई निवेश 20% से ज्यादा गिर जाए तो उसके पलटकर बढ़ने का इंतज़ार न करो। इतना घाटा पचा लो, नहीं तो वो निवेश गले की हड्डी बन जाएगा। मान लें कि कोई स्टॉक 90 दिन केऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के व्यवहार से जुड़े लोग बताते हैं कि यहां से लम्बे समय के निवेशक दरअसल कुछ खास नही कमाते। वे केवल मुद्रास्फीति के असर को सोख पाते हैं। लम्बा निवेश, चाहे वो किसी स्टॉक में हो या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में, अच्छी से अच्छी स्थिति में अमूमन उसका सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न 12-14% से ज्यादा नहीं होता। धन के समय मूल्य को न देखें और बीच के समय को काटकर सीधे-सीधे आज की तुलनाऔरऔर भी

बाज़ार को समझना है तो उससे जुड़े इंसान को समझना होगा, बाज़ार से कमाना है तो उससे जुड़े उन इंसानों को समझना होगा जो यहां से बराबर कमाते रहते हैं। यहां से दो तरह के लोग कमाते हैं। एक लम्बे समय के निवेशक और दूसरे छोटी अवधि के ट्रेडर। यह भी कहा जाता है कि शेयर बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और केवल 5% ट्रेडर ही कमाते हैं। लेकिन सच्चाई को अपने आसपास के व्यवहार से समझनेऔरऔर भी