सृजन व पीड़ा में अभिन्न रिश्ता है। प्रकृति ने तो सृजन की हर प्रक्रिया के साथ खुशी व उन्माद के ऐसे भाव जोड़ रखे हैं कि पीड़ा गौड़ हो जाती है। सामाजिक सृजन में इंसान को यह काम खुद करना पड़ता है।और भीऔर भी

जैसी कि उम्मीद थी, निफ्टी फ्यूचर्स गिरते-गिरते 5341 तक चला गया जो सोमवार की भारी गिरावट की तलहटी, 5326 से बस थोड़ा ही ऊपर है। आज का न्यूनतम स्तर उससे ऊंचा 5341 का रहा और यहां से 5277 अब भी काफी दूर है। इसने आज 5400 तक लोगों को शॉर्ट करने के लिए भी उकसाया और बंद हुआ 5381.65 पर। अगर कल यह 5427 को पार कर लेता है तो निश्चित रूप से 5500 के पार जानेऔरऔर भी

अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी

प्रकृति की संरचनाएं जैसी जटिल हैं, वैसी ही जटिलता हमारे भाव-संसार, विचारों की दुनिया और सामाजिक रिश्तों में भी है। जो इसे नहीं देख पाते या नज़रअंदाज़ करते हैं, वे अक्सर ठोकर खाते रहते हैं।और भीऔर भी

जहां गंदगी होती है, क्षरण वहीं होता है। जहां सफाई है, वहां स्वाभाविक विकास चलता रहता है। यही प्रकृति का नियम है। इसलिए विकास के लिए जरूरी शर्त है कि गंदगी को बराबर साफ करते रहा जाए।और भीऔर भी

फूल तो गुलाब भी है और बेला भी। अलग हैं लेकिन एक भी। यह भिन्नता प्रकृति व समाज दोनों में अपरिहार्य है। जो इसे तोड़कर एकसार बनाना चाहते हैं, वे समाज ही नहीं, प्रकृति के भी अपराधी हैं।और भीऔर भी

अंदर की प्रकृति को बाहर की प्रकृति से मिला देना, प्रकृति के साथ एकाकार हो जाना ही लक्ष्य है। सत्ता और समाज अपने-आप में साध्य नहीं, बल्कि साधन हैं प्रकृति की विपुल संपदा में अपना हिस्सा पाने के।और भीऔर भी

कोई भी फर्क मामूली नहीं। ज़रा-सा फर्क मूल प्रकृति बदल देता है। कोशिका के 46 में से एक क्रोमोज़ोम के अंतर से पुरुष स्त्री बन जाता है। इसलिए बारीक अंतरों को कतई नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए।और भीऔर भी

बाजार अचानक कुछ ज्यादा ही उत्साह में है। कल मैंने कहा था कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती की घोषणा कर सकता है। आज वही बात कुछ बिजनेल चैनलों व समाचार एजेंसियों ने चला दी। फिर इसे कुछ फंड मैनेजरों ने हवा दे दी। बाजार में चर्चा चल पड़ी कि आज ही बाजार बंद होने के बाद रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती की घोषणा कर सकता है। फिर क्या था! बाजार बढ़ा तो बढ़ता हीऔरऔर भी

हमारी खुशी का मूल स्रोत प्रकृति है। समाज तो बस बिचौलिया है जो बनने-बनते हजारों साल में बना है। इस बात को समझकर हम मूल प्रकृति के जितना करीब जाएंगे, हमारी खुशी उतनी बढ़ती जाएगी।और भीऔर भी