हम प्रकृति से बने हैं। प्रकृति के सामने अक्सर बेबस हो जाते हैं। लेकिन समाज के सामने बेबसी बकवास है। समाज को हमने बनाया है तो इसे ठोंक-पीटकर बराबर दुरुस्त करते रहने का काम भी हमारा है।और भीऔर भी

एक हद के बाद हम कुछ नहीं कर सकते। फिर जो भी है, वह दूसरे को ही करना होता है। यह दूसरा प्रकृति भी हो सकती है और इंसान भी। प्रकृति पर हमारा वश नहीं, लेकिन इंसान को समाज ठीक कर सकता है।और भीऔर भी

बीज डाल दो। मिट्टी पौधे से पेड़ बन जाती है। सुंदर फूल व फल में ढल जाती है। हमारा काम चेतना का बीज फेंकने का है। बाकी काम प्रकृति का है। हम कुछ जोड़-घटा नहीं सकते। बस सज्जा बदल सकते हैं।और भीऔर भी

खुशी न खाने में है, न सोने में। पीने में थोड़ी-सी है क्योंकि इससे हम अपनी मूल प्रकृति के करीब आ जाते हैं। असली खुशी गुत्थियां सुलझाने में है क्योंकि इससे हम अपने परिवेश के साथ लयकार हो जाते हैं।और भीऔर भी

प्रकृति हर पल नाना रूपों में अपने ऐसे तमाम रहस्य हमें बताती रहती है जो हमारे खुश रहने के लिए जरूरी हैं। लेकिन हम हैं कि अपने में ही डूबे रहते हैं। बाहर देखते नहीं तो अंदर के कपाट बंद पड़े रहते हैं।और भीऔर भी

जब तक जिंदा हूं, देख-सुन सकता हूं, तब तक जहां तक निगाहें, वहां तक फतेह। घर छीन लो, समाज छीन लो। लेकिन प्रकृति को कौन मुझसे छीन सकता है? वो तो जन्म से मेरी है और मरने पर भी रहेगी।और भीऔर भी

क्लोन तो दोहराव है। उसमें सृजन कहां? जब प्रकृति के संसर्ग से नए से नया सृजन कर सकते हैं तो क्लोन पर मशक्कत क्यों? नियमों को समझकर प्रकृति के बीच रचने का आनंद प्रयोगशालों में नहीं मिलता।और भीऔर भी

पीपल और बरगद दीवारों व छतों तक पर मजे से उग जाते हैं। लेकिन सायास गमलों में लगाओ तो सूखने लगते हैं। असल में हम उन्हें वो संतुलन नहीं दे पाते जो वे प्रकृति प्रदत्त गुण से खुद बना लेते हैं।और भीऔर भी

प्रकृति ने जो हमें दिया है, उसे मानकर चलना चाहिए। लेकिन समाज ने जो दिया है, वहां हम मानकर चलते हैं तो दूसरे की मौज हो जाती है। खुश रहने के लिए सतत असंतोष जरूरी है। संतोष तो बस छलावा है।और भीऔर भी

ज्ञान-विज्ञान की सारी जद्दोजहद प्रकृति व परिवेश के साथ पूरा तादात्म्य बनाने के लिए है। जो है, उसे समझने के लिए है। लेकिन एक के जानते ही पुराना बदल जाता है। इसलिए ज्ञान की यात्रा अनवरत है।और भीऔर भी