krishna-gopis

जो भी पैदा हुआ है, वह मरेगा। यह प्रकृति का चक्र है, नियम है। ट्रेन पर सवार हैं तो ट्रेन की होनी से आप भाग नहीं सकते। कूदेंगे तो मिट जाएंगे। यह हर जीवधारी की सीमा है। इसमें जानवर भी हैं, इंसान भी। लेकिन जानवर प्रकृति की शक्तियों के रहमोकरम पर हैं, जबकि इंसान ने इन शक्तियों को अपना सेवक बनाने की चेष्ठा की है। इसमें अभी तक कामयाब हुआ है। आगे भी होता रहेगा। मगर, यहांऔरऔर भी

जीने के साधनों की सौदेबाज़ी में ज़िंदगी इस कदर निचुड़ जाती है कि हम जीने लायक ही नहीं बचते। हालांकि चाहें तो हम इनके बगैर भी मजे से जी सकते हैं। इसके लिए दो ज़रूरी चीजें हैं प्यार और प्रकृति, जहां सिर्फ समर्पण चलता है, सौदेबाज़ी नहीं।और भीऔर भी

प्रकृति है। उसके नियम हैं। समाज है। उसके भी नियम हैं। समाज के अलग-अलग घटकों के भी नियम हैं। जो प्रकृति और समाज के नियमों को समझते हैं, वे ही नया कुछ रचते हैं। बाकी या तो बहती गंगा में हाथ धोते हैं या औरों के हाथों ठगे जाते हैं।और भीऔर भी

अपने-आप में तो हर कोई पूर्ण है। जानवर भी पूर्ण, इंसान भी पूर्ण। ओस की बूंद तक एकदम गोल। प्रकृति ने संतुलन का नियम ही ऐसा चला रखा है। पर बाहर से देखो तो सब कुछ अपूर्ण। गुमान तोड़कर देखने पर ही यह अपूर्णता नज़र आती है।और भीऔर भी

प्रकृति खुद को नई करती रहती है तो हर तरफ जीवन है। समाज को हमने, इंसानों ने बनाया है जिसकी संरचना चरण-दर-चरण जटिल होती जा रही है। इसे हम बराबर नया नहीं करते रहे तो इसमें जान नहीं बचेगी, वो मृत हो जाएगा।और भीऔर भी

यहां सब कुछ बदलता है हर पल। घूमता है, चलता नहीं। एक चक्र है जिसमें चीजें जहां से चली थीं, घूम-फिरकर वहीं कहीं आसपास आ जाती हैं। हां, समय चलता है निरंतर! लेकिन समय तो एक टेक्नोलॉजी है जिसे प्रकृति ने नहीं, हमने ईजाद किया है।और भीऔर भी

भोर से पहले आंख बंदकर सोचते रहते हैं तो हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है। आंखें खोलकर देखते हैं तो इस बीच हर तरफ उजाला आ चुका होता है। लेकिन प्रकृति का यह नियम क्या समाज पर भी लागू होता है?और भीऔर भी