शरीर है पहले
शिव है तो शक्ति है। धरती है तो गुरुत्वाकर्षण है। शरीर है तो मन है। मन को निर्मल रखना है तो पहले शरीर को सहज व शुद्ध रखना जरूरी है। बाद में मन भी शरीर को साधने में मदद करता है।और भीऔर भी
निखरेगा कुंदन
दिमाग की धमनभठ्ठी को धधकने दें। विचारों की आंधी को धौंकनी बना दें और आग्रहों-पूर्वाग्रहों के खर-पतवार को ईंधन। रक्ताभ ज्वाला में फिर निखरेगा कुंदन, शांत व सम्यक ज्ञान का कुंदन।और भीऔर भी
लंबवत बनाम क्षैतिज!
हाथ फैलाते जाइए, लोगों से जुड़ते जाइए, नेटवर्क बनाते जाइए। यह विकास का क्षैतिज तरीका है। लेकिन मन से जुड़ना और मन से बढ़ना है तो इंसान के अपने अंदर का ऊर्ध्व विकास जरूरी है।और भीऔर भी
अनहद की राह
शरीर को साधकर पहलवान बना जा सकता है और मन को साधकर वैज्ञानिक। लेकिन अनहद का उल्लास दोनों ही नहीं पा सकते। यह तो उन्हीं को मिलता है जो तन और मन दोनों को साधते हैं।और भीऔर भी
पोर-पोर में मन
मन में आए भाव-विचार के माफिक शरीर रसायन बनाता है और शरीर में पहुंचे रसायन मन को घुमा डालते हैं। फिर, रसायन तो रक्त के साथ पोर-पोर तक जाता है तो मन भी हर पोर तक पहुंच जाता होगा!और भीऔर भी
दिमाग का दस्तूर
किताबों में अच्छी बातें पढ़ते हैं। ज्ञान की अच्छी बातें सुनते हैं। लेकिन चंद दिनों में वे उड़ जाती हैं। इसलिए क्योंकि दिमाग तो काम की जरूरी बातें ही सजोकर रखता है। इसलिए पहले जरूरत बढ़ाओ बंधुवर!और भीऔर भी
तन, मन, आत्मन
तन है, मन है और आत्मा भी है। पदार्थ और चेतना के अलग-अलग स्वरूप हैं। आपस में ऐसे जुड़े हैं कि अलग हो ही नहीं सकते। एक के खत्म होने पर दूसरा खल्लास। इसलिए इन तीनों को स्वस्थ रखना जरूरी है।और भीऔर भी
चेतना का राज
हमारे शरीर में एक स्वतंत्र प्रणाली बराबर काम करती है। चेतना कोई फैसला करे, दिमाग इससे पहले ही फैसला कर चुका होता है। लेकिन इंसान होने का लाभ यह है कि चेतना दिमाग के फैसले को पलट भी सकती है।और भीऔर भी
