चुनावी लोकतंत्र की सारी राजनीति परसेप्शन या माहौल बनाने पर चलती है। रोज़ी-रोटी चलाने के बोझ से दबे करोड़ों मतदाताओं के पास फुरसत नहीं कि राजनीतिक पार्टियों की कथनी और करनी के मर्म को समझकर वोट डालें। उनकी याददाश्त छोटी होती है और वे माहौल के हिसाब से बहते व वोट देते हैं। शेयर बाज़ार का भी यही हाल है। राजनीति व शेयर बाज़ार, दोनों ही जगहों पर छोटे समय में सत्य नहीं चलता। भाव या सत्ताऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतना विश्वास है कि कैबिनेट बैठक में नई सरकार के पहले 100 दिनों का एक्शन-प्लान तय कर डाला। बैठक में प्रमुख मंत्रालयों के सचिवों ने बाकायदा प्रजेंटेशन रखा कि 2047 में विकसित भारत के विज़न के लिए अगले पांच सालों में क्या-क्या किया जा सकता है। इसमें गरीबी का खात्मा, हर युवा को हुनरमंद बनाना और कल्याण योजनाओं को पूर्णाहुति तक पहुंचाना शामिल है। वैसे यह कवायतऔरऔर भी

जब सरकार बेईमान हो तो जनता की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वो बेहद ईमानदारी से सच का पता लगाती रहे। नहीं तो देश को रसातल में डूबते देर नहीं लगती। बीते हफ्ते गुरुवार, 29 फरवरी को सरकारी आंकड़ा आया कि चालू वित्त वर्ष 2023-24 की तीसरी यानी अक्टूबर-दिसंबर 2023 की तिमाही में देश का जीडीपी 8.4% बढ़ गया है। हर किसी का अनुमान था कि बहुत हुआ तो इस दौरान जीडीपी 6.5% ही बढ़ेगा। लेकिन बढ़औरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी खासियत है कि जिस बात पर उनको घेरा जा सकता है, उसे ही वे अपना मुख्य प्रचार बना लेते हैं। 2014 से अब तक उन्होंने जो कहा, वो किया ही नहीं। अच्छे दिन नहीं आए, विदेश गया कालाधन नहीं आया, हर देशवासी के खाते में 15 लाख रुपए नहीं आए, हर साल दो करोड़ नौजवानों को रोज़गार नहीं मिला, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई, नोटबंदी से न कालाधनऔरऔर भी

मोदी सरकार भ्रष्टाचार को सदाचार में कैसे बनाती रही है, इसकी सटीक मिसाल है चुनावी बांड। जिसे जनता जनार्दन कहा जाता है, उसे पता ही नहीं कि किस देशी-विदेशी कंपनी ने किस राजनीतिक पार्टी को कितना चंदा दे दिया। बस, देनेवाला जानता है किसको दिया और पानेवाला जानता है कि किसने दिया। डील हो गई। डंके की चोट पर कॉरपोरेट रिश्वतखोरी को चुनावी फंडिंग का वैधानिक हिस्सा बना दिया गया। लेकिन सरकार ने कहा कि चुनावी बांडऔरऔर भी

प्रगति कभी हवा में नहीं होती। विकास हमेशा निरंतरता में होता है। यह कहना सफेद झूठ, सरासर धोखा और फरेब है कि मई 2014 से पहले देश में कुछ हुआ ही नहीं और सब कुछ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही हुआ। जिन जनधन खातों, आधार और मोबाइल (जेएएम या जैम) को मोदी सरकार अपनी सफलता का मूलाधार बताती है, इन सभी की नींव मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के शासन में रखीऔरऔर भी

मोदी सरकार की श्रेय लेने की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है बैंकों के जनधन खाते। 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री जनधन योजना इस अंदाज़ में लॉन्च की गई, जैसे पहले कुछ था ही नहीं। हद तो तब हो गई, जब दो महीने पहले ही केंद्र में विदेशी मामलों से लेकर संस्कृति तक की राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी ने 28 दिसबर 2023 को बयान दिया कि कांग्रेस के राज में आजादी से लेकर मई 2014 तक देश मेंऔरऔर भी

श्रेय लेने की राजनीति की भी कोई हद होती है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार के बजट में शतरंज के चैम्पियन बढ़ने का भी श्रेय ले लिया। उन्होंने कहा था कि भारत में साल 2010 में 20 से कम ग्रैंडमास्टर थे, जबकि आज 80 से ज्यादा ग्रैंडमास्टर है। उनके आका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो श्रेय लेने की राजनीति में उस्तादों के भी उस्ताद निकले। मोदी सरकार की गारंटी वाले एक विज्ञापन में दावा किया गयाऔरऔर भी

पहली बार अच्छे दिन और विदेश से कालाधन वापस लाने का जुमला था। मतदाता ने भरोसा किया। दूसरी बार पुलवामा के शहीदों के नाम पर अवाम की देशभक्ति को ललकारा गया। तब भी मतदाता ने तहेदिल से साथ दिया। लेकिन न अच्छे दिन आए, न विदेश से कालाधन और न ही देश की बाहरी-भीतरी सुरक्षा मजबूत हुई। हां, इतना ज़रूर हुआ कि विरोधियों पर ईडी व सीबीआई के हमले तेज कर दिए गए। विपक्ष के जो नेताऔरऔर भी

इसे राजनीतिक अवसरवाद की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या कहेंगे कि जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले चुनावी सभाओं व रैलियों में खुद को अति पिछड़ा बताते थे, वे अब कहने लगे हैं कि भारत में केवल चार ही जातियां हैं – गरीब, युवा, महिलाएं और किसान। उनमें यह बदलाव तब आया, जब विपक्ष के इंडिया गठबंधन ने जाति जनगणना का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा दिया। प्रधानमंत्री पिछड़ी व दलित जातियों की गोलबंदी को रोकने के लिए नईऔरऔर भी