हमारे विशाल देश भारत में रोज़गार की समस्या विकट सच्चाई है। इसे किसी भी जुमले या हवाबाज़ी से नहीं हल किया जा सकता। हमारी आबादी का मीडियम या मध्यमान 28 साल का है। हमें यह भी समझना होगा कि लोगबाग सरकार से नौकरियां नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां चाहते हैं जिनसे रोज़ी-रोज़गार के मौके बढ़ें। मुठ्ठी भर ज्यादा पढ़े-लिखे लोग ही सरकारी नौकरियों के चक्कर में पड़ते हैं और आरक्षण के लिए मारा-मारी करते हैं। बाकी ज्यादातर लोगऔरऔर भी

गजब स्थिति है। सब कुछ ऐड-हॉक है, तदर्थ है। लेकिन जनता को सपना बेचे रहे हैं 1947 में देश को विकसित बनाने का। चुनाव हैं तात्कालिक। भाजपा कार्यकर्ताओं से लेकर अफसरों व कर्मचारियों को उज्ज्वला, आयुष्मान व मुफ्त राशन जैसी सरकारी योजनाओं के प्रचार में झोंक दिया गया है। लेकिन नाम दिया गया है विकसित भारत संकल्प यात्रा। देश में ज़रूरत है कि निजी उद्योगों को शामिल करके रोज़गार की समस्या को युद्धस्तर पर हल किया जाए।औरऔर भी

जिस मानव संसाधन या डेमोग्राफिक डिविडेंड पर हमारी अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार है, वही सबसे ज्यादा उपेक्षित है। देश में 1968 की शिक्षा नीति में तय हुआ था कि केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर हर साल जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करेंगी। 1986 की नीति में भी यही लक्ष्य दोहराया गया। अभी सबसे नई बनी 2020 की शिक्षा नीति में भी वही लक्ष्य दोहराया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि यह लक्ष्य आज तक कभीऔरऔर भी

ज्यादा कर्जदार देश को समृद्ध नहीं माना जा सकता। विकास का अगला पैमाना है कि औसत भारतीय कितना खुशहाल हुआ है? इसे जीडीपी के समग्र आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति जीडीपी से मापा जाएगा। मार्च 2014 में हमारा प्रति व्यक्ति जीडीपी 1559.86 डॉलर था। यह मार्च 2023 में 2612.45 डॉलर रहा है। यह गणना मौजूदा मूल्यों पर की गई है। अगर नौ सालों में औसत मुद्रास्फीति की दर को 5% मानें तो 2014 के 1559.86 डॉलरऔरऔर भी

निरर्थक बहसों में उलझाकर अवाम का ध्यान भटकाया जा रहा है और देश के भविष्य को खतरे में डाला जा रहा है। राजनीति में राम का घटाटोप तो आर्थिक मोर्चे पर जीडीपी के आकार का वितंडा। जीडीपी पांच ट्रिलियन डॉलर हो जाने का मतलब विकास नहीं होता। विकास का मतलब है देश की समृद्धि और औसत देशवासी की खुशहाली। क्या पिछले नौ सालों में देश समृद्ध हुआ है? देश पर मार्च 2014 में आंतरिक व बाहरी, दोनोंऔरऔर भी

आलोचनाएं बहुत हो रही हैं। पूरा हिसाब लगाकर बताया जा रहा है कि सरकार 2025 या 2026 में भी भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बना पाएगी। सवाल उठाया जा रहा है कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाना महज राजनीतिक जुमला तो नहीं। लेकिन सरकार मदमस्त हाथी की तरह सारी आलोचनाओं की परवाह किए बिना दावे करती जा रही है। इस बीच मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंतिम बजट की तैयारियां पूरीऔरऔर भी

जब नीयत गलत हो, मंशा में खोट हो तो बड़ी-बड़ी बातों व दावों का कोई मतलब नहीं रह जाता। नौ साल से केंद्र की सत्ता में विराजमान और अगले पांच साल तक सत्ता पाने का यकीन रखनेवाली मोदी सरकार को किसी दूसरे पर यकीन नहीं। वह अपनी सत्ता में बनाए रखने की कुव्वत रखनेवाले चंद लोगों की ही सुनती है और उन पर कोई आंच न आए, इसी की गारंटी देती है। इसके लिए उसने जांच एजेंसियोंऔरऔर भी

भारत को 2047 तक विकसित देश बनना है तो हमारी अर्थव्यवस्था को अगले 24 साल तक 9.41% की सालाना चक्रवद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ना होगा। हमारा जीडीपी 2019 से 2023 तक औसतन 4% सालाना की दर से बढ़ा है। अभी उसकी दर 6-7% की रेंज में है। सब इसी में मगन हैं कि हम दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। किसी के पास कोई रोडमैप नहीं कि 2047 तक कैसे 9% की सीएजीआरऔरऔर भी

आज की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मोदी सरकार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अर्थव्यवस्था को भलीभांति समझता हो। सब कुछ नौकरशाहों और जी-हुजूरी करनेवालों के हवाले है। पीएमओ प्रधानमंत्री की सोच व कर्म का ही एक्सटेंशन है। जो भी मोदी की नहीं मानता, उसे जाना पड़ता है चाहे वो रिजर्व बैंक गवर्नर ऊर्जित पटेल हों या मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन। ऐसे में अर्थव्यवस्था ऑटो-पायलट मोड में है या कहें तो राम-भरोसेऔरऔर भी

तेरह साल गुजरात के मुख्यमंत्री और नौ साल से देश के प्रधानमंत्री रहे नरेंद्र दामोदर दास मोदी की हरेक हरकत, सारी कथनी-करनी, बोली-वाणी, सारा कुछ हाइप पर टिका है। शेयर बाज़ार भी मूलतः हाइप पर चलता है। इसलिए इन दोनों का मेल बड़ा घातक और खतरनाक है। राजनीति का तो पता नहीं, लेकिन शेयर बाज़ार का हाइप पर टिका हर बुलबुला एक न एक दिन फूटता ही है। और, वो दिन रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों के लिएऔरऔर भी