अर्थव्यवस्था की जो स्थिति अभी है और अगले एकाध साल में जो हो सकती है, यह सारी जानकारी शेयर बाज़ार हर समय जज्ब करके चलता है। इसलिए किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए कि वह अर्थव्यवस्था को जानकर शेयर बाज़ार का सफल निवेशक बन सकता है। हां, इसका उल्टा ज़रूर सही है कि शेयर बाजार प्रचार के शोर को भेदकर अर्थव्यवस्था का सच्चा हाल बयां कर देता है। जैसे, इस समय निफ्टी-50 सूचकांक में शामिल चार कंपनियोंऔरऔर भी

जीडीपी की विकास दर घटने को दो अन्य वजहें ज्यादा संगीन है और भारत की विकासगाथा पर कुठाराघात करती हैं। सरकार टैक्स संग्रह बढ़ने को अपनी नीतियों की सफलता बताती है। जैसे, नवंबर में जीएसटी से ₹1,82,269 करोड़ मिले तो उसने खूब वाहवाही लूटी। लेकिन अवाम से ज्यादा टैक्स वसूलना देश के विकास के लिए घातक है। हमारे यहां केंद्र से लेकर राज्य व लोकल टैक्सों को मिला दें तो वे जीडीपी का 19% बनते हैं, जबकिऔरऔर भी

जीडीपी की विकास दर के धीमा पड़ने की तीन खास वजहें हैं और तीनों की ज़िम्मेदार केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक की नीतियां हैं। पहली है वास्तविक ब्याज दरों का ज्यादा होना। रिजर्व बैंक ने 21 महीनों से रेपो दर (वो ब्याज़ दर जिस पर रिजर्व बैंक बैंकों को दो-तीन दिन का ऋण देता है) को 6.5% पर ही बांधे रखा है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर में रिटेल मुद्रास्फीति की दर 6.21% और खाद्य वस्तुओं वऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था की विकास दर पत्थर पर लिखी इबारत नहीं होती, न लम्बी अवधि की और ना ही छोटी अवधि की। शेयर बाज़ार की तरह उसकी गति कतई रैण्डम भी नहीं होती। अगर ऐसा होता तो नीति बनानेवालों की कोई ज़रूरत ही नहीं होती। सब कुछ भगवान-भरोसे या आज के संदर्भ में कहें तो राम-भरोसे होता। अर्थव्यवस्था या जीडीपी की विकास दर हमेशा सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों से तय होती है। नीतियां सही नहीं रहीं तो सारीऔरऔर भी

एक तरफ ‘मोदी-अडाणी एक हैं’ के नारे का जवाब भाजपा ‘राहुल-सोरोस एक हैं’ से दे रही है। दूसरी तरफ भारत की विकासगाथा की कलई उतरती जा रही है। सितंबर महीना बीतने के बाद 9 अक्टूबर को पेश मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही या सितंबर तिमाही में जीडीपी की विकास दर 7%, तीसरी तिमाही में 7.4%, चौथी तिमाही में 7.4% और पूरे वित्त वर्ष में 7.2% का अनुमान उछाला था। लेकिनऔरऔर भी

क्या भारत की विकासगाथा इतनी भुरभुरी, कमज़ोर बुनियाद और कच्ची दीवार पर खड़ी है कि भ्रष्टाचार का सच उजागर करने से खतरे में पड़ जाएगी और जो भी इस मुद्दे को उठाने की कोशिश करेगा, उसे गद्दार व देशद्रोही करार दिया जाएगा? ऐसा होना तो नहीं चाहिए। लेकिन देश में इस वक्त यही हो रहा है। भरी संसद में भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस सांसद और नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी को देशद्रोही करार दिया। वहीं, संसदऔरऔर भी

शेयर बाज़ार तो चक्रों में चलता है। लेकिन हमें निवेश की अपनी सोच व रणनीति को हमेशा संतुलित रखना होता है। भावना में बहकर लिए गए फैसले निवेश की सफलता के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। भीड़ की भेड़चाल में नहीं फंसना है। न कभी लालच में आकर निवेश करना है, न ही डरकर अफरातफरी में बेचकर निकल जाना है। निवेश से रिटर्न कमाने के तीन मुख्य रास्ते हैं। एक, उधार देकर उस पर ब्याज कमाना। देशऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में नियमन के नाम पर किसी भी विचार को दबाना बाज़ार के विकास को कुंठित करना है। ऐसा करने पर बाजार मूल्य-खोज की भूमिका ही नहीं निभा सकता। यहां तो हज़ारों विचारों को खुलकर टकराने देना चाहिए। नहीं तो बाज़ार का आधार व्यापक नहीं, बल्कि मुठ्ठी भर ऑपरेटरों के हाथ में सिमटकर रह जाएगा। आज भारतीय शेयर बाज़ार की हालत कमोबेश ऐसी ही है। अब इसके ऊपर सेबी डिजिटल प्लेटफॉर्म को मान्यता देने के नामऔरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने करीब डेढ़ महीने पहले 22 अक्टूबर को शेयर बाज़ार पर लिखने या बोलने वाले तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म को कंट्रोल करने के लिए जो मशविरा पत्र जारी किया है, उस पर वो अंततः सर्कुलर जारी करके अपना अंकुश कस देगी। पब्लिक से सलाह लेने की बात तो महज खानापूरी होती है। यह कंट्रोल उन लोगों के लिए है जो अभी तक सेबी के नियामक दायरे से बाहर हैं। बाकी जो भी पूंजीऔरऔर भी

देश की पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी की ज़िम्मेदारी है कि वो करोड़ों मासूम निवेशकों की हिफाजत करे। सुनिश्चित करे कि बाज़ार में पहले से लिस्टेड और आईपीओ लाने वाली नई कंपनियां सारी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराएं। लेकिन यहां तो स्थिति यह है कि खुद सेबी की चेयरपरसन माधबी पुरी बुच ने अडाणी की ऑफशोर कंपनियों में अपने निवेश की बात छिपाई है। उन पर पूंजी बाज़ार के नियमों की अवहेलना करने और पद कीऔरऔर भी