नींबू की गरमी उतरने का नाम नहीं ले रही। एक तो इस मार्च महीने में 122 सालों की सबसे ज्यादा गरमी पड़ी तो डिमांड बढ़ गई। दूसरे, नींबू की फसल का ताज़ा सीजन मौसम की मार चढ़ गया तो सप्लाई घट गई। इसके ऊपर से महंगे पेट्रोल-डीजल ने मालभाड़े को आसमान पर पहुंचा दिया। शेयर बाज़ार में डिमांड-सप्लाई का यही खेल बराबर चलता रहता है। आप कहेंगे कि यहां तो शेयरों की सप्लाई स्थिर ही रहती है।औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश करना विज्ञान है और कला भी। हमारी काबिलियत जानकारी व अनुभव के साथ बढ़ती जाती है। फिर भी अच्छे निवेश के साथ बुरे निवेश से भी हर किसी का साबका पड़ता है। वॉरेन बफेट जैसे धुरंधर निवेशक भी इससे नहीं बच पाए। 1993 मे उन्होंने डेक्सटर शू कंपनी में 44.30 करोड़ डॉलर का निवेश किया जिसे बाद में उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी गलती माना। इसमें उनका सारा निवेश डूब गया था। सवालऔरऔर भी

उम्मीद है कि डब्बा ट्रेडिंग पर दी गई जानकारी से आपकी जिज्ञासा शांत हुई होगी और इस गैर-कानूनी ट्रेडिंग का तिलिस्म टूट गया होगा। साफ समझ लें कि हम-आप ईमानदारी से टैक्स देनेवाले आम नागरिक हैं। हमें शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग के लिए मान्यता-प्राप्त स्टॉक एकसचेंजों को ही चुनना चाहिए। आज तो इनका तंत्र ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ज़रिए देश के कोने-कोने तक फैल चुका है। सौदे की लागत में ब्रोकरेज से लेकर, एक्सचेंज व सेबीऔरऔर भी

क्या शेयर बाज़ार में चल रही डब्बा ट्रेडिंग से स्टॉक्स के भावों पर कोई असर पड़ता है? य़ह पता लगाना बेहद मुश्किल है क्योंकि कोई नहीं जानता कि इस गैर-कानूनी बाज़ार का टर्नओवर क्या है, इसमें कितना धन आता और निकलता है। हां, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि डब्बा ट्रेडिंग का जो हिस्सा ऑपरेटर एक्सचेंज पर ले जाते हैं, उसका थोड़ा असर स्टॉक्स के भावों पर पड़ता होगा। बताते हैं कि डब्बा ट्रेडिंग में शुक्रवारऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हो रही गैर-कानूनी डब्बा ट्रेडिंग में ट्रेड करनेवाले क्लाएंट को कोई फायदा नहीं होता। इसमें ऑपरेटर ही कमाते हैं। वे अपने जाल में कमज़ोर हैसियत वाले लोगों को फांसते हैं और उन्हें निचोड़ डालते हैं। अगर क्लाएंट ने कभी कमा भी लिया तो ऑपरेटर उसे भुगतान नहीं करता। फिर भी सेबी की सख्ती के बावजूद डब्बा ट्रेडिंग चल रही है तो इसकी वजह है मूर्ख लोगों की लालच और मक्कार ऑपरेटर का जाल। निष्कर्षऔरऔर भी

शेयर बाज़ार स्वभाव से ही अधीर है। लेकिन इसमें लम्बे समय के लिए निवेश करनेवालों को बड़ा धैर्यवान होना पड़ता है। उन्होंने अधीरता दिखाई तो यहां से कभी कमा नहीं सकते। अधीर स्वभाव वाले निवेशकों को सरकारी बॉन्डो, पीपीएफ या बैंक डिपॉजिट का ही आसरा लेना चाहिए। नहीं तो शेयर बाज़ार के निवेश को लेकर वे ताज़िंदगी रोते ही रहेंगे कि मार डाला, हाय! मारा डाला। संभावनामय बिजनेस वाली कंपनी चुनो और भूल जाओ। कंपनी के कामकाजऔरऔर भी

डब्बा ट्रेडिंग में ऐसे भी मामले होते हैं कि एक्सचेंज के सर्वर पर कोई सौदा नहीं होता। क्लाएंट को घाटा हो रहा होता है, फिर भी वह सौदा नहीं काटता। वह घाटे पर सौदा काट भी ले तो ऑपरेटर उसे क्रेडिट दे देता है। असल में उसका सारा तंत्र हवा-हवाई होता है। उसे बस क्लाएंट को चूना लगाना होता है। आपसे धन लेना होगा तो ऑपरेटर आपके घर रिकवरी एजेंट भेज देगा। लेकिन उसको धन देना होगाऔरऔर भी

जो डब्बा ऑपरेटर स्टॉक एक्सचेंज के जरिए और ब्रोकर को शामिल करके आपके डब्बा ट्रेड को अंजाम देता है, वह यकीनन गैर-कानूनी काम करता है। लेकिन जो डब्बा ऑपरेटर एक्सचेंज का सहारा नहीं लेता, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है। वह चूंकि एक्सचेंज या किसी ब्रोकर को शामिल नहीं करता तो उसे न कोई मार्जिन देना होता है और न ही ब्रोकरेज, इसलिए आपसे बहुत कम शुल्क लेता है। लेकिन वह अपनी कोई पूंजी नहीं लगाता और केवलऔरऔर भी

अपने यहां शेयर बाज़ार में सक्रिय डब्बा ऑपरेटर दो तरह के होते हैं। एक जो आपके ट्रेड को एक्सचेंज के प्लेटफॉर्म पर ले जाता है। लेकिन आप से सारी रकम कैश में लेता है। अपने खाते में अपने नाम से ही ट्रेड करता है। स्पैन से लेकर मार्क टू मार्केट मार्जिन तक देता है। यह ऑपरेटर चूंकि रिस्क ले रहा है तो इसके एवज़ में वो डब्बा ट्रेडर से पूरा ब्रोकरेज लेता है। दूसरा डब्बा ऑपरेटर वोऔरऔर भी

जब हमारे स्टॉक एक्सचेंजों में इंट्रा-डे से लेकर डेरिवेटिव ट्रेडिंग तक की पूरी सहूलियत है, तब आखिर लोगबाग डब्बा ट्रेडिंग जैसे गलत व गैर-कानूनी काम करते ही क्यों हैं? इसके कुछ बड़े साफ कारण हैं। पहला तो यह कि डब्बा ट्रेडिंग करानेवाला ऑपरेटर गैरकानूनी ट्रेडिंग कर रहा है तो वह ट्रेड करनेवालों से कोई स्पैन मार्जिन, मार्क टू मार्केट रकम वगैरह नहीं लेता, न ले सकता है। वो बहुत हुआ तो लोगों से मोटामोटी सांकेतिक या. टोकनऔरऔर भी