कुछ लोग शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से इसलिए घबराते हैं कि इससे होनेवाली आय को बिजनेस आय माना जाएगा और उन्हें ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा। वे यह नहीं समझते कि वे अपनी जेब से नहीं, बल्कि अपनी कमाई पर टैक्स दे रहे हैं। कमाया तभी तो उसका एक हिस्सा टैक्स के रूप में चुकाया। नहीं कमाते तो कहां से टैक्स देते! कहने का सार यह है कि पहले कमाने की सोचें। टैक्स देने के भय से कमानेऔरऔर भी

डिमांड ज़ोन के आसपास खरीदो और सप्लाई ज़ोन की रेंज में पहुंचते ही बेचकर मुनाफा कमा लो। खरीदने और बेचने का दरमियानी फासला कुछ दिन से लेकर एकाध महीने से ज्यादा का भी हो सकता है। लेकिन किसी भी हालत में ट्रेडिंग या कहें तो अल्पकालिक निवेश की अवधि 90 दिन या तीन महीने से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। नहीं तो आप फंस जाओगे तो कई सालों में बहुत हुआ तो अपनी बचत को मुद्रास्फीति के असरऔरऔर भी

भारत जैसी संभावनाओं से भरी उभरती अर्थव्यवस्था में सम्पूर्ण शेयर बाज़ार या व्यावहारिक रूप से कहें तो निफ्टी-50 या सेंसेक्स-30 जैसे सूचकांकों के ईटीएफ में निवेश करना सदा के लिए होना चाहिए। ऐसा निवेश पांच, दस या बीस साल बाद तभी बेचकर मुनाफा निकालना चाहिए, जब खास ज़रूरत पड़ जाए। इनके बाहर कुछ ही कंपनियां होती हैं जिनमें निवेश सदा के लिए होता है। बाकी तमाम कंपनियों में किया निवेश ऐसा होता है कि लक्ष्य पूरा करतेऔरऔर भी

शेयर बाजार से कमाने का क्या है मध्यमार्ग? बाज़ार की ज़मीनी हकीकत से जुड़े लोग बताते हैं कि यहां से वही कमाता है, जो नियमित बेचता रहता है। ज्यादा से ज्यादा 90 दिन में बेचकर निकल लो और फायदा कमा लो। कोई निवेश 20% से ज्यादा गिर जाए तो उसके पलटकर बढ़ने का इंतज़ार न करो। इतना घाटा पचा लो, नहीं तो वो निवेश गले की हड्डी बन जाएगा। मान लें कि कोई स्टॉक 90 दिन केऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के व्यवहार से जुड़े लोग बताते हैं कि यहां से लम्बे समय के निवेशक दरअसल कुछ खास नही कमाते। वे केवल मुद्रास्फीति के असर को सोख पाते हैं। लम्बा निवेश, चाहे वो किसी स्टॉक में हो या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में, अच्छी से अच्छी स्थिति में अमूमन उसका सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न 12-14% से ज्यादा नहीं होता। धन के समय मूल्य को न देखें और बीच के समय को काटकर सीधे-सीधे आज की तुलनाऔरऔर भी

बाज़ार को समझना है तो उससे जुड़े इंसान को समझना होगा, बाज़ार से कमाना है तो उससे जुड़े उन इंसानों को समझना होगा जो यहां से बराबर कमाते रहते हैं। यहां से दो तरह के लोग कमाते हैं। एक लम्बे समय के निवेशक और दूसरे छोटी अवधि के ट्रेडर। यह भी कहा जाता है कि शेयर बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और केवल 5% ट्रेडर ही कमाते हैं। लेकिन सच्चाई को अपने आसपास के व्यवहार से समझनेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहार की चीज़ है। जो भी यहां ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं, उन्हें इसके व्यावहारिक पहलुओं से ज्यादा मतलब होना चाहिए। हालांकि ट्रेडिंग सीखनी है तो सैद्धांतिक पहलुओं को भी थोड़ा-थोड़ा समझकर ही आगे बढ़ सकते हैं। सैद्धांतिक पहलुओं पर भरपूर सामग्री इंटरनेट पर मिल जाती है जिसे गाहे-बगाहे पढ़ते रहना चाहिए। लेकिन असली पहलू है व्यावहारिक जिसे हम केवल और केवल अपने अभ्यास से ही साध सकते हैं। एक बातऔरऔर भी

शेयर बाज़ार किसी गूढ़ मंत्र से बंधा नहीं, न ही इसे सीखना कोई रॉकेट साइंस है। फाइनेंस न जाननेवाला शख्स भी इसमें पारंगत हो सकता है। लेकिन इसकी दो मूलभूत शर्तें हैं। एक, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण और दो, जो जैसा है उसे वैसा देखने की खुली बुद्धि। ये दोनों ही शर्तें नियमित अभ्यास से पूरी की जा सकती है जिसे हम साधना भी कह सकते हैं। अपने यहां जिस तरह बेरोगगारी की समस्या बेलगाम होती जाऔरऔर भी

सारी दुनिया में इस समय महंगाई विकट समस्या बन गई है। सितंबर में अपने यहां थोक मुद्रास्फीति की दर 10.70% और रिटेल मुद्रास्फीति की दर 7.41% रही है। इसी दौरान अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर 8.2%, यूरो ज़ोन में 9.9% और ब्रिटेन में 10.1% रही है। वहां यह दो-चार साल नहीं, करीब चार दशकों का उच्चतम स्तर है। बड़े-बड़े देशों की मुद्राएं भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरती जा रही हैं। अपना रुपया भी इस साल डॉलरऔरऔर भी

लैरी विलियम्स ने बेटी मिशेल को ज़ीरो से सिखाना शुरू किया। तब तक साहित्य व थियेयर की पृष्ठभूमि वाली मिशेल को फाइनेंस का क-ख-ग-घ भी नहीं आता था। फाइनेंशियल कैलकुलस, टेक्निकल एनालिसिस और ट्रेडिंग टर्मिनल उसके लिए अजूबी चीज़ें थी। लेकिन पिता के निर्देशन में बेटी धीरे-धीरे भावों के चार्ट और ट्रेडिंग स्क्रीन की बारीकियां समझने लगी। यहीं से उसके महारथी बनने की यात्रा शुरू हो गई। पिता लैरी विलियम्स ने 1987 में ट्रेडिंग की रॉबिन्स कपऔरऔर भी