जिस तरह घोड़े पर अच्छी सवारी करने के लिए उससे जान-पहचान और दोस्ती बनानी पड़ती है, उसी तरह हमें जिन शेयरों में ट्रेड करना है, उसका स्वभाव समझना पड़ता है, उससे अच्छी जान-पहचान बनानी पड़ती है। तभी हम सही मौके पर उन्हें खरीद और बेचकर ट्रेडिंग से मुनाफा कमा सकते हैं। शेयरों का स्वभाव उसमें सक्रिय ट्रेडरों व निवेशकों की प्रवृत्ति से बनता है। कुछ शेयर अच्छे होते हैं, लेकिन लम्बे समय तक चलते ही नहीं। इसलिएऔरऔर भी

रिस्क बहुत ज्यादा हो तो इंसान को निराशावादी हो जाना चाहिए और रिस्क काफी कम हो तो आशावादी। जबरदस्त रिस्क के माहौल में आशावाद हमारी नैया डुबा सकता है, जबकि निराशावाद से घिरे होने के कारण हम बहुत-बहुत फूंक-फूंककर सावधानी से चलेंगे तो बचने की गुंजाइश भरपूर रहेगी। वहीं, रिस्क बहुत कम हो तो आशावाद से लबालब होकर हम सुरक्षित फैसले ले सकते हैं, जबकि निराशावाद में डूबने पर अच्छे-खासे सुरक्षित मौके भी हमारे हाथ से निकलऔरऔर भी

शेयरों के भाव बढ़ते हैं क्योंकि धन उनका पीछा करता है। धन उनका पीछा किसी खबर या अनुमान की वजह से करता है। इस चक्र में खबर की खास अहमियत है। लेकिन शेयर बाज़ार में कोई खबर सार्वजनिक रूप से ही सबके लिए बाहर आती है। अप्रकाशित या अघोषित खबर पर ट्रेडिंग करना इनसाइडर ट्रेडिंग हैं और ऐसा करना दंडनीय अपराध है। लेकिन अपने यहां खुद कंपनी प्रवर्तक ही अपने शेयरों में खेल करते और करवाते हैं।औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग अंततः विशुद्ध रूप से शत-प्रतिशत सट्टेबाज़ी है, भले ही हम उसे वित्तीय आज़ादी पाने, अपना बॉस खुद बनने या मुद्रास्फीति से लड़ने के माध्यम जैसा कितना भी सम्मानजनक नाम क्यों न दे दें। इसे हर किसी को स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसके बाद असली मसला यह बचता है कि इस सट्टेबाज़ी के तत्व को कम से कम करने के लिए हम बाज़ार में सक्रिय शक्तियों के संतुलन की संभाव्य समझ किस हद तकऔरऔर भी

हर कोई शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग इसीलिए करता है कि जब शेयरों के भाव बढ़ेंगे तो बेचकर मुनाफा कमा लेंगे। यह अलग बात है कि इसी बाज़ार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो शेयरों के भाव गिरने पर कमाते हैं। लेकिन उनका पूरा तंत्र और तरीका अलग है। फिलहाल तो अहम सवाल यह है कि शेयरों के भाव क्यों बढ़ते हैं? जवाब है कि इसके पीछे धन की महिमा है। धन जिन शेयरोंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार से बिना धांधली या घोटाले के कितना कमाया जा सकता है इसकी मिसाल हैं राकेश झुनझुनवाला। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी सीख भारत के सभी निवेशकों व ट्रेडरों के लिए प्रतिमान है। बाप मुंबई में इनकम टैक्स कमिश्नर थे तो धन-दौलत और शान-ओ-शौकत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन बेटे को शेयर बाज़ार में लगाने के लिए पैसे देने से मना कर दिया और हिदायत दी कि वो दोस्तों से भीऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार की कड़वी हकीकत यह है कि यहां कमाते कम और गंवाते ज्यादा हैं। जो शेयर बाज़ार के धंधे से सीधे जुड़े हैं, ब्रोकर या किसी अन्य बिचौलिये के रूप में, वे ज़रूर सदाबहार कमाई करते हैं। लेकिन बाकियों की हालत अक्सर खराब ही रहती है चाहे वो लम्बे समय के निवेशक हों या छोटी अवधि के ट्रेडर। ऐसे में सहज स्वाभाविक सवाल उठता है कि हमेशा ऊंच-नीच से गुजरते शेयर बाज़ार से कमाने कीऔरऔर भी

मुद्रास्फीति रोकने का ज़िम्मा रिजर्व बैंक का है। उसके पास इसे निभाने के लिए एकमात्र साधन मौद्रिक नीति है। ब्याज दर बढ़ाकर वह धन महंगा करता है, सीआरआर बढ़ाकर मुद्रा का प्रवाह कम करता है। लेकिन अपने यहां खाद्य वस्तुओं की महंगाई सरकारी नीतियों से बढ़ती है। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव घटे। लेकिन केंद्र ने उसका लाभ उपभोक्ता तक पहुंचने नहीं दिया। एक्साइज़ बढ़ाकर उसने आठ साल में करीब 25 लाख करोड़ रुपए का टैक्स बजटऔरऔर भी

हमारे यहां दस साल पहले तक थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित मुद्रास्फीति प्रमुख थी। यह मुद्रास्फीति जून में 15.18% ऱही है। इसकी तुलना अमेरिका में प्रचलित प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) आधारित मुद्रास्फीति से की जा सकती है जो जून में 9.1% और जुलाई में 8.5% है। साल 2012 से हम उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित मुद्रास्फीति पर आ गए। यह जून में 7.01% थी। लेकिन इसमें 45.86% योगदान खाने-पीने की चीजों का है। अकेले खानेऔरऔर भी

सिर पर चोट लगी हो तो आप घुटनों पर पट्टी नहीं बांधते। लेकिन अपने यहां भारतीय रिजर्व बैंक ऐसा ही कर रहा है। मुद्रास्फीति रोकने के लिए ब्याज दर बढ़ा देना अमेरिका जैसे विकसित देशों का सर्वमान्य तरीका है क्योंकि वहां धन सस्ता होने से लोग उधार पर लेकर जमकर खर्च करते हैं जिससे माल व सेवाओं की मांग बढ़ जाती है और सप्लाई सीमित होने के कारण मुद्रास्फीति या महंगाई बढ़ जाती है। इसलिए धन कोऔरऔर भी