यह भारत देश है, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश। यहां बात लाखों में नहीं, करोड़ों में होती है। यहां करोड़ों किसान खेती-बाड़ी से फसल उगा रहे हैं। करोड़ों मजदूर व कर्मचारी अटक से कटक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक खेत-खलिहानों, फैक्ट्रियों, होटलों व ऑफिसों में मेहनत-मशक्कत से सरप्लस पैदा कर रहे हैं। करोड़ों छात्र-छात्राएं और युवा सुरक्षित भविष्य के लिए मगजमारी से लेकर डग्गेमारी तक कर रहे हैं। करोड़ों छोटे-छोटे उद्यम कठिन-कठोर प्रतिकूल हालात में भीऔरऔर भी

बजट का शोर थम चुका है। विदेशी निवेशकों को जो सफाई वित्त मंत्री से चाहिए थी, वे उसे पा चुके हैं। अब शांत हैं। निश्चिंत हैं। बाकी, अर्थशास्त्रियों का ढोल-मजीरा तो बजता ही रहेगा। वे संदेह करते रहेंगे और चालू खाते का घाटा, राजकोषीय घाटा, सब्सिडी, सरकार की उधारी, ब्याज दर, मुद्रास्फीति जैसे शब्दों को बार-बार फेटते रहेंगे। उनकी खास परेशानी यह है कि धीमे आर्थिक विकास के दौर में वित्त मंत्री जीडीपी के आंकड़े को 13.4औरऔर भी