काइयां कॉरपोरेट तक से बदतर सरकार

यह भारत देश है, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश। यहां बात लाखों में नहीं, करोड़ों में होती है। यहां करोड़ों किसान खेती-बाड़ी से फसल उगा रहे हैं। करोड़ों मजदूर व कर्मचारी अटक से कटक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक खेत-खलिहानों, फैक्ट्रियों, होटलों व ऑफिसों में मेहनत-मशक्कत से सरप्लस पैदा कर रहे हैं। करोड़ों छात्र-छात्राएं और युवा सुरक्षित भविष्य के लिए मगजमारी से लेकर डग्गेमारी तक कर रहे हैं। करोड़ों छोटे-छोटे उद्यम कठिन-कठोर प्रतिकूल हालात में भी देश ही नहीं, दुनिया तक के लिए उत्पादन कर रहे हैं। करोड़ों नौजवान ब्लिंकिट, ज़ोमैटो, फ्लिपकार्ट, अमेज़ॉन से लेकर ओला-उबर तक की सेवा में दिन-रात एक करके गुज़ारा कर रहे हैं। इन करोड़ों लोगों के साथ ही जो करोड़ों बूढ़े, बच्चे, दिव्यांग, मां-बहन, बेटियां व जवान बचते हैं, सभी सरकार को टैक्स दे रहे हैं। सरकार ने पिछले बारह सालों में पैन, आधार व बैंक खातों का ऐसा केवाईसी किया है कि देश मेें कुछ भी कमानेवाला व्यक्ति इनकम टैक्स से बच नहीं सकता। छह साल से सरकार कॉरपोरेट टैक्स से ज्यादा व्यक्तिगत इनकम टैक्स वसूल रही है। इसके ऊपर से देश में जीएसटी आने के बाद भिखारी तक टैक्स देने से बच नहीं सकता। कमाल की बात है कि गरीबी में गुजर-बसर करनेवाली 50% आबादी देश का 64.3% जीएसटी देती हैं। फिर भी देश आखिर कर्ज में क्यों डूबता जा रहा है?

खुद सरकार के डेटा के मुताबिक पिछले बारह सालों में भारत पर चढ़ा कुल आंतरिक व बाह्य ऋण 3.53 गुना हो चुका है, जबकि इस दौरान हमारा नॉमिनल जीडीपी नई सीरीज के मुताबिक 113.45 लाख करोड़ रुपए का 3.05 गुना 346.36 लाख करोड़ ही हुआ है। अर्थव्यवस्था की तुलना में देश पर चढ़ा ऋण ज्यादा बढ़ा है। मार्च 2014 में यह 55.87 लाख करोड़ रुपए था, जबकि मार्च 2026 में 197.18 लाख करोड़ रुपए हो गया और मार्च 2027 तक इसके बढ़कर 214.82 लाख करोड़ रुपए हो जाने का बजट अनुमान है। मार्च 2026 तक सरकार के ऊपर चढ़े कुल 197.18 लाख करोड़ रुपए के ऋण में से 190.44 लाख करोड रुपए का आंतरिक ऋण है, जबकि 6.74 लाख करोड़ रुपए का बाहरी या विदेशी ऋण है।

यह चालू वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में दिया गया डेटा है। मगर, विदेशी ऋण के डेटा में बड़ी विसंगति चल रही है। रिजर्व बैंक के मुताबिक देश पर मार्च 2026 के अंत में कुल 762.8 अरब डॉलर का ऋण था, जो 95 रुपए प्रति डालर की विनिमय दर पर 7.25 लाख करोड़ रुपए निकलता है। खैर, यह ऋण मार्च 2014 के अंत में 446.3 अरब डॉलर हुआ करता था। बारह साल में 70.92% वृद्धि। वो भी तब, जब मार्च 2014 में डॉलर 60 रुपए का हुआ करता था और मार्च 2026 में 95 रुपए के पार चला गया है। मतलब उसी डॉलर के लिए देश को अब पहले से 58.33% रुपए ज्यादा चुकाने पड़ेंगे।

क्या देश की ऋणग्रस्तता बढ़ने की वजह वे 81.35 करोड़ गरीब लोग हैं जिन्हें सरकार महीने का पांच किलो मुफ्त राशन देने के लिए छह साल से बराबर हर साल करीब 2 लाख करोड़ रुपए खर्च कर रही है या वे 10-11 करोड़ किसान परिवार हैं जिन्हें सालाना 65,000 करोड रुपए की सम्मान निधि दी जा रही है? लेकिन यही तो वे लोग हैं जो सरकार को हर साल जीएसटी के कुल 10 लाख करोड़ रुपए के संग्रह का 64% यानी 6.40 लाख करोड़ रुपए का बड़ा हिस्सा देते हैं। किसान और गरीब सरकार को हर साल जितना जीएसटी देते हैं, उसका बमुश्किल एक-तिहाई हिस्सा उन्हें आपात सहायता के रूप में मिल रहा है। फिर सरकार किसका हित साधने के लिए देश को ऋण के दलदल में ढकेलती जा रही है? सीधा-सरल उत्तर है, अपना और अपनों के साथ दलगत स्वार्थ साधने के लिए भाजपा-नीत एनडीए सरकार ऐसा कर रही है। उसे देश या राष्ट्रीय हित की कोई परवाह नहीं है।

असल में मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा देश को देश की तरह नहीं चला रही, बल्कि किसी कॉरपोरेट की तरह लूट रही है जिसका मकसद सत्ता पर अधिकतम जकड़ बनाकर अपने मुनाफे को अधिकतम करते जाना है। कॉपोरेट में भी उसकी हरकत वर्तमान के राजेश एक्सपोर्ट्स और अतीत के सत्यम कंप्यूटर्स जैसी है जिन्होंने झूठ के बल पर अपना नकली साम्राज्य खड़ा किया था। भाजपा ने सत्ता पर जकड़ मजबूत करने के लिए असीमित वित्तीय ताकत का इस्तेमाल देश के युवाओं को रोज़गार देने में नहीं, बल्कि 24 घंटे हिंदू-मुस्लिम विमर्श को जिंदा रखने और ट्रोल सेना खड़ी करने में लगा दिया। इसी के साथ उसने विभाजक राजनीति के दम पर हासिल बहुमत व सत्ता के बल पर देश की हर लोकतांत्रिक संस्था पर कब्जा कर लिया। चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक। इस क्रम में उसने लोकजीवन की किसी भी नैतिकता की परवाह नहीं की। चाहे मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन और रिटायरमेंट के बाद भी उसके सारे पाप माफ करने की कानूनी व्यवस्था हो या भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे व्यक्ति को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना देना। तमाम विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अयोग्यतम लोग हैं। यहां तक कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) जैसे प्रोफेशनल संस्थान का वाइस चांसलर उसने एक अवसरवादी और सत्ता के दलाल व चाटुकार व्यक्ति को बना दिया है। यह व्यक्ति कभी वामदल सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई का कार्यकर्ता हुआ करता था। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों तक के शीर्ष नेतृत्व पर सरकार ने कब्जा कर लिया है।

दरअसल, भाजपा सरकार ने उन सभी संस्थाओं पर कब्ज़ा कर लिया है जो सत्ता की शक्तियों पर किसी न किसी तरह का अंकुश लगाती थी। इन संस्थाओं को उसने देश के चंद औद्योगिक घरानों की सेवा में लगा दिया है। ऊपर से इस काले कृत्य को हिंदुत्व के भगवा चोले में लपेट दिया है। व्यवहार में हो यह रहा है कि जहां एक तरफ देश के जल, जंगल व ज़मीन को विकास के नाम पर अदाणी, अम्बानी या लॉयड जैसे समूहों को कौड़ियों के दाम बेचा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आस्था के नाम पर राम मंदिर में करोड़ों की चढ़ावा चोरी हो रही है और गरीब परिवारों के किशोरों व युवाओं को कांवड़ यात्रा में उन्मादी बना दिया गया है। राष्ट्र का मतलब हिंदू राष्ट्र हो गया है। इसके लिए ऐसी वैधानिक, चुनावी और परिसीमन जैसी भौगोलिक इंजीनियरिंग की जा रही है ताकि कहीं से भी उसकी सत्ता को चुनौती न मिल सके। उसने स्कूलों में डार्विन के विकासवाद की पढ़ाई बंद कर दी तो इतिहास के पढन-पाठन में समूचा मध्यकाल ही निगल गई। वर्तमान की लूट के लिए भाजपा सरकार अतीत के सही ज्ञान को खत्म करने का अभियान चला रही है।

साल 2014 में सरकार बनाने के साथ भाजपा के राजनीतिक तंत्र को चंद कॉरपोरेट घरानों के हितों के साथ नत्थी कर दिया गया। यह ऐसा रिश्ता है जिसमें सत्ता और निजी पूंजी के बीच की दीवार खत्म हो गई है। मोदी सरकार अदाणी के हितों के बचाने के लिए अमेरिका में ट्रम्प के आगे बिछ जाती है और देशहित की कुर्बानी दे देती है। अदाणी ने मोदी को चुनाव प्रचार के लिए हेलिकॉप्टर दिए तो मोदी सरकार ने उस पर देश के तमाम एयरपोर्ट, बंदरगाह और खदानें न्योछावर कर दी। वेदांता समूह रोता रह गया है। लेकिन कम बोली लगाने पर भी जेपी एसोसिएट्स अदानी को दे दी गई। यही नहीं, अदाणी के हितों को ही बचाने के लिए मोदी हमारे पड़ोसी दुश्मन देश चीन के खिलाफ चूं तक नहीं करते। चीन ने गलवान घाटी में हमारे हज़ारों किलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर रखा है। लेकिन मोदीराज में देश से चीन से हो रहा आयात कुलांचे मारकर बढ़ता जा रहा है। चीन आज दुनिया में अमेरिका को पीछे छोड़कर हमारा सबसे बड़ा व्यापार पार्टनर बन गया है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का एक ही ध्येय है किसी भी तरह देश की सत्ता पर कब्जा बनाए रखना ताकि वो जनधन व टैक्स से मिले खजाने की अबाध लूट करती रहे और राष्ट्रीय सम्पदा को अपनों के हवाले करती रहे। पिछले बारह सालों मे वो कितनी सफल हुई है, इसकी गवाही देते हैं देश के हर जिले में भाजपा के आलीशन ऑफिस और दिल्ली में आईटीओ के पास दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर उसका पांच मंजिला, सात सितारा शानदार महल। चुनाव आयोग के मुताबिक भाजपा ने 2014 से 2024 के बीच अपने ऑफिसों को बनाने पर 3561 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। भाजपा ने बीते वित्त वर्ष 2025-26 का वित्तीय लेखा-जोखा चुनाव आयोग को नहीं सौंपा है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में उसकी आय 6769.15 करोड़ रुपए थी, जिसमें से 634.10 करोड़ रुपए तो उसे बैंकों से ब्याज के रूप में मिले थे। कमाल की बात है कि पार्टी इतनी अकूत कमाई पर भारत सरकार को एक धेले का टैक्स नहीं देगी। वो कहने को जितना टैक्स देती है, वो सारे का सारा उसे रिफंड मिल जाता है। मसलन, उसने आकलन वर्ष 2025-26 में सरकार को कुल 65.93 करोड़ रुपए का टैक्स दिया और उसे यह पूरी रकम रिफंड में वापस मिल गई। यह है कि सत्ता शीर्ष पर बैठे रहने का कमाल।

भाजपा अपने मित्रों का कैसे फायदा कराती है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है 2014 से 2026 तक के बारह सालों में गौतम अदाणी की संपत्ति को 44,000 करोड़ रुपए से करीब 18 गुना बढ़कर 7.8 लाख करोड़ रुपए हो गई। भाजपा अपने पितृ-संगठन का कैसे फायदा करवाती है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है दिल्ली के जिस पहाड़गंज इलाके के झंडेवालान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय केशव कुंज से सटी खुली नालियों में पेशाब की गंध आती रहती थी, वहां 3.75 एकड़ में फैला संघ का नया 13 मंजिलों का 300 कमरों वाला मुख्यालय। इसमें तीन टावर है जिनका नाम साधना, प्रेरणा और अर्चना रखा गया है। किसकी साधना, किसकी प्रेरणा और किसकी अर्चना? इसकी घोषित लागत 150 करोड़ रुपए बताई जाती है। लेकिन अघोषित और असली लागत क्या है, कोई नहीं जानता। सौ साल के हो चुके जिस संगठन का बहीखाता तो छोड़िए, देश में कहीं कोई पंजीकरण ही न हो, उसके बारे में सच का पता देश की सर्वशक्तिमान सरकार ही लगा सकती है। लेकिन संघ ही भाजपा और भाजपा ही सरकार है तो मोदी सरकार के रहते संघ के सच का पता नहीं लग सकता।

कैसी विचित्र स्थिति है। अगर सरकार अपने हर नागरिक की हर लेनदेन व हरकत की जानकारी रखती है, यहां तक प्रदर्शन में शामिल युवाओं को फेस-रिकगनिशन सॉफ्टवेयर से पहचान लेती है, वहां ज़रूरी है कि सरकार की भी हर हरकत को पता देशवासियों को रहे। यह किसी भी आधुनिक व स्वस्थ लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। लेकिन भारत को दुनिया भर में ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ कहकर बेचनेवाले नरेंद्र मोदी अपनी सरकार का सारा किताब जनता से छिपाने में लगे हैं। उनकी सरकार लम्बी लड़ाई के बाद यूपीए सरकार में बनाए गए सूचना अधिकार कानून को भी कुंद करती जा रही है। पीएम केयर फंड पर बरती गई घनघोर गोपनीयता मोदी सरकार की अलोकतांत्रिक नीयत को साफ कर देती है। असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने छलबल पर इतना भरोसा है कि वे नोटबंदी में 500 और 1000 रुपए के नोट बंदकर कालेधन को खत्म करने के लिए 2000 रुपए का नोट ले आते हैं, तब भी कोई सवाल नहीं उठाता। मीडिया 2000 के नोटों में चिप होने की कहानी गढ़ देता है और मोदी कालेधन को सफेद करने की अपनी कामयाबी पर मंद-मंद मुस्कराते हैं।

मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा-नीत एनडीए तभी तक ऐसा छल कर सकता है, जब तक वो सत्ता में बना रहे। इसके लिए उसने किसी धूर्त कॉरपोरेट की तरह अधिग्रहण, विलय और जबरन हथिया लेने का रास्ता अपना रखा है। याद करें कि कितने राज्यों की सरकार गिराकर भाजपा ने वहां अपनी सरकार बनाई है। मध्य प्रदेश, गोवा, कर्णाटक, मणिपुर के वाकये अब पुराने पड़ गए है। शिवसेना को तोड़ा, एनसीपी को साफ किया, अकाली दल को निगल गई, नीतीश की जेडी-यू कहने भर को बची है, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों का सफाया कर दिया और ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस का तिनका-तिनका उड़ा दिया।

राजनीति में सत्ता के साथ ही बाहुबल और धनबल का इस्तेमाल कोई भाजपा से सीखे। अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार ने अब देश भर में एसआईआर का अभियान चला रखा है। इसके जरिए सरकार तय करने में लगी है कि देश में किस को वोट देने का अधिकार होगा और किसको नहीं। राजा अब खुद प्रजा का चुनाव कर रहा है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बड़ा अशुभ लक्षण है। लेकिन इन अशुभ को तोड़ने का आगाज हो चुका है। अब तो आगे-आगे क्या होता है, इसका उद्घाटन होते जाना है। जल्दी ही नए भारत का शिलान्यास देश के किशोर और नौजवान करने जा रहे हैं जिन्हें ज़ेन अल्फा और ज़ेन जी कहा जा रहा है।

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