बुद्ध क्यों नहीं!
बाहर से सब कुछ भरा-पूरा, अंदर से परेशान। सदियों पहले एक राजकुमार इसी उलझन को सुलझाने निकला तो बुद्ध बन गया। नया दर्शन चल पड़ा। सदियों बाद लाखों लोग सब कुछ होते हुए भी वैसे ही बेचैन हैं। लेकिन कोई बुद्ध नहीं बनता। आखिर क्यों?और भीऔर भी
सुख का स्रोत
जितना हम जानते जाते हैं, सुख का स्तर उतना ही उन्नत होता जाता है और दुख का दायरा उतना ही बढ़ता जाता है। उलझाव बढ़ने से दुख बढ़ता है और उन्हें सुलझाते जाओ तो सुख बढ़ता चला जाता है।और भीऔर भी
रिश्तों की गांठ
जब गांठें पड़ती हैं तो उसे हम खोलकर सुलझाते हैं, काटकर नहीं। काट देने से गांठ नहीं जाती, बल्कि रिश्तों की डोर छोटी होती चली जाती है। रिश्तों की डोर को बढ़ाना है तो हर गांठ खोलकर सुलझानी पड़ेगी।और भीऔर भी
काहे को रोये?
रोजमर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाते तो एक दिन ये उलझनें आपको ही ‘सुलझा’ देती हैं। तब आप किस्मत का रोना रोते हैं, जबकि थोड़े तनाव से बचने के लिए ये हालात आपने खुद ही पैदा किए होते हैं।और भीऔर भी


