किसी कंपनी में निवेश बनाए रखना या निकालना मजबूरी में नहीं, हमारी मर्जी से तय होना चाहिए। कभी-कभी सब कुछ देखभाल कर खरीदने के बावजूद किसी वजह से कंपनी के शेयर गिरने लगते हैं। मगर हम घाटा खाने से घबराते हैं और उससे अरसे तक इस उम्मीद में चिपके रहते हैं कि हो सकता है पलट जाए। समझदारी इसमें है कि खरीद मूल्य से 25% गिरते ही हमें उससे बेझिझक निकल लेना चाहिए। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

शेयर बाज़ार इस साल मार्च के बाद से लगभग 15% गिर चुका है तो बिजनेस चैनलों व अखबारों में विश्लेषक बताने लगे हैं कि अब ब्लूचिप कंपनियों को खरीद लेना चाहिए। लेकिन कौन-सी ब्लूचिप? हो सकता है कि गिरी हुई ब्लूचिप सड़ी हुई निकली। जैसे, किसी ज़माने की ब्लूचिप रिलायंस कैपिटल 2008 में 79% गिरने के बाद 36% और गिर चुकी है। तब 92% गिरा यूनिटेक 85% और गिर चुका है। आज पेश है एक सॉलिड ब्लूचिप…औरऔर भी

अभी दुनिया की जो आर्थिक हालत है, चीन तक की स्थिति डांवाडोल है, उसे देखते हुए क्या भारत में अब भी दीर्घकालिक निवेशकों के लिए कोई संभावना बची है? यह विषय निबंध के लिए अच्छा है। लेकिन हम जैसे आम निवेशकों के लिए इसका कोई मायने-मतलब नहीं। इसे संस्थाओं की मगजमारी के लिए छोड़ देना चाहिए। हमें तो अच्छी कंपनी को सही भाव पर पकड़ने की कोशिश में लगे रहना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

यह कंपनी नोट नहीं छापती, बैंक भी नहीं है। लेकिन कैश इसकी ताकत है। खास कमोडिटी के धंधे से जुड़ी है। लेकिन जिंसों के अंतरराष्ट्रीय भाव 16 साल की तलहटी पर हैं, चीन की आर्थिक सुस्ती से समूची दुनिया त्रस्त है, डंपिंग का मंडराता खतरा है, तब भी इससे कंपनी की सेहत पर कोई फर्क नहीं। फिर, सरकारी कंपनी होने के बावजूद इसने शेयरधारकों की दौलत घटाई नहीं, बढ़ाई है। तथास्तु में आज इसी कंपनी का दमखम…औरऔर भी

बाज़ार कभी हमारे हिसाब से नहीं चलता। हमें ही बाज़ार के हिसाब से चलना पड़ता है। तभी हम उससे कमा पाते हैं। हम आगे बढ़कर अनुमान ज़रूर लगाते हैं। लेकिन मानकर चलते हैं कि अनुमान गलत भी हो सकता है। तभी तो स्टॉप-लॉस या पोजिशन साइजिंग के ज़रिए रिस्क को बांधकर चलते हैं। वैसे, लंबे निवेश के लिए अभी मौज का दौर है क्योंकि तमाम मजबूत स्टॉक्स गिरे पड़े हैं। तथास्तु में ऐसी ही एक दमदार कंपनी…औरऔर भी

कोयल कभी घोंसला नहीं बनाती। वो बड़ी चालाकी से अपने अंडे कौए के घोंसले में डाल देती है। शेयर बाज़ार में निवेश करना ऐसा ही है। बस ‘कौए’ की सही पहचान होनी चाहिए। ऐसा न हो कि वो आपका ‘अंडा’ ही खा जाए। बुरी कंपनियां निवेशकों की दौलत खा जाती हैं, जबकि अच्छी कंपनियां शेयरधारकों की दौलत बराबर बढ़ाती जाती हैं। आज तथास्तु में ऐसी कंपनी जिसने 37 सालों में दिया है 21% का सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न…औरऔर भी

भारत विशाल संभावनाओं वाला देश है। प्रकृति की जैसी कृपा व संपदा हमारे पास है, जैसा इंसानी जीवट देश के कोने-कोने तक फैला है, उसके आपसी मेल से भारत कहीं का कहीं पहुंच सकता है। और, इस मेल-मिलाप व सहयोग का मंच बाज़ार उपलब्ध कराता है। सरकार इसके खिलने में बाधा न डाले, माकूल नीतियों से इसे प्रेरित करे तो बाकी काम अवाम की उद्यमशीलता कर डालती है। इसी का नमूना है तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

बचत सही जगह नहीं लगाई तो उसे मुद्रास्फीति की दीमक खा जाएगी। निवेश का मूल मकसद मुद्रास्फीति को काटना है। बैंक एफडी सुरक्षित है। लेकिन साल का 9% भी ब्याज मिले तो 10% टैक्स कटने के बाद रिटर्न 8.1% रह जाता है। वहीं, लिस्टेड कंपनी में निवेश करें और एक साल बाद बेचकर जितना भी फायदा कमाएं, उस पर टैक्स नहीं लगता। ऊपर से वो 8.2% लाभांश दे तो क्या कहने! आज तथास्तु में यही दिलदार कंपनी…औरऔर भी

13-14 साल पहले तक कंपनियों के आईपीओ नहीं, पब्लिक इश्यू आया करते थे। तब कंट्रोलर ऑफ कैपिटल इश्यूज़ शेयरों का इश्यू मूल्य तय किया करता था जो अमूमन कम होते थे और आम निवेशक पब्लिक इश्यू से अच्छा कमाते थे। अब तो आईपीओ वेंचर कैपिटल या प्राइवेट इक्विटी फंडों के निकलने का ज़रिया बन गए हैं तो भाव पहले से चढ़े होते हैं। इसलिए हमें आईपीओ से दूर ही रहना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

लहलहाती फसल देख मन ललचा जाता है कि काश, ये खेत अपना होता। शानदार बंगला देखकर लगता है कि इसके मालिक होते तो मज़ा आ जाता। लेकिन इनके मालिकाने की एक रत्ती भी पाने की गुंजाइश नहीं होती। वहीं, लिस्टेड कंपनियों के मालिकाने का अंश हम शेयरों के ज़रिए खरीद सकते हैं। लेकिन खरीदें तभी जब मन में आए कि कितनी सॉलिड कंपनी है। काश, हम भी इसके मालिक होते! अब तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी