अज्ञान की विरासत
जिस प्रकार ज्ञान विचारों और संस्कारों के रूप में आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है, उसी प्रकार अज्ञान भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की विरासत बन जाता है। इसलिए अज्ञान को मिटाते रहना हमारा दायित्व है।और भीऔर भी
जिस प्रकार ज्ञान विचारों और संस्कारों के रूप में आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है, उसी प्रकार अज्ञान भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की विरासत बन जाता है। इसलिए अज्ञान को मिटाते रहना हमारा दायित्व है।और भीऔर भी
ऊंचा उठने की एक सीमा होती है। उसके बाद ठहरकर अगल-बगल बढ़ना होता है। फिर एक से अनेक होकर विस्तार का सिलसिला चलता है। प्रकृति से लेकर विचार व रचना तक यही होता है। समझ लें तो अच्छा है।और भीऔर भी
जब तक कोई विचार हमारे अंदर उमड़ता-घुमड़ता रहता है, तब तक हम या तो उस पर लट्टू रहते हैं या दो कौड़ी का समझते हैं। विचार की असली ताकत तो उसे सामाजिक आयाम मिलने पर ही सामने आती है।और भीऔर भी
जटिलता तभी तक है जब तक बीच में अटके हैं। समझा नहीं है। तह तक पहुंचने पर सब आसान हो जाता है। सबसे अच्छा विचार सबसे सरल होता है। ज्ञान के सागर का सारा सार प्रेम का ढाई आखर ही होता है।और भीऔर भी
जो कल सही था, आज भी सही हो, जरूरी नहीं। विचार या व्यक्ति का सही होना तय करती है प्रासंगिकता। हर वस्तु व इंसान की तरह विचार का भी जीवनकाल होता है। हर विचार को नया जन्म लेना ही पड़ता है।और भीऔर भी
कामयाब लोगों के घनेरों विचार, जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाले बहुतेरे सूत्र, गुरुओं की वाणी। हम पढ़ते हैं, सुनते हैं। वाह-वाह करते हैं, झूम जाते हैं। पर मंत्र नहीं मिलता क्योंकि हम उन्हें अपना नहीं बनाते।और भीऔर भी
जाति-आधारित राजनीतिक दलों के दबाव में देश में अब वह काम होने जा रहा है जिसे 1947 में आजादी के बाद ही सायास छोड़ दिया गया था। कैबिनेट ने गुरुवार को जाति-आधारित जनगणना को मंजूरी दे दी। यह जनगणना अगली साल फरवरी से मार्च तक सामान्य जनगणना के खत्म होने के बाद जून से शुरू की जाएगी और इसे सितंबर तक खत्म कर लिया जाएगा। इससे पहले देश में आखिरी जाति-आधारित जनगणना अंग्रेजों के शासन में 1931औरऔर भी
किसी अनोखे विचार पर गुमान पालना ठीक नहीं क्योंकि हम विचार को नहीं, विचार हमें चुनता है। आइंसटाइन का नाम गिलबर्ट भी हो सकता था और गैलीलियो का अब्राहम भी। इसलिए नाम नहीं, काम से वास्ता रखो दोस्त!और भीऔर भी
सेल्समैन होने में कोई बुराई नहीं। हम सभी सेल्समैन ही तो हैं। बचपन से लेकर बड़े होने तक अपनी बातें, अपनी जिद ही तो बेचते रहते हैं। हां, बस इतना है कि हमको वही बेचना चाहिए जिस पर खुद हमें पूरा यकीन हो।और भीऔर भी
जिस तरह दही को मथने से मक्खन निकलता है, उसी तरह मंत्रों का निरंतर जाप हमारे अंदर छिपी शक्तियों को बाहर निकालता है। मंत्र राम भी हो सकता है और मरा भी। यह वाक्य भी हो सकता है और विचार भी।और भीऔर भी
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