सहारा व सुब्रत रॉय पर सेबी का फंदा

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने एक आदेश जारी कर सहारा समूह के मुखिया सुब्रत रॉय और उनके तीन सहयोगियों वंदना भार्गव, रविशंकर दुबे और अशोक रॉय चौधरी पर बंदिश लगा दी है कि वे अगले आदेश तक किसी भी प्रपत्र (सिक्यूरिटी) के जरिए पब्लिक से धन जुटाने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई विज्ञापन, प्रॉस्पेक्टस या अन्य दस्तावेज जारी नहीं कर सकते। यह आदेश सेबी के पूर्णकालिक निदेशक के एम अब्राहम ने सहारा समूह की दो कंपनियों – सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसएचआईसीएल) द्वारा कानूनी नुक्तों की आड़ में गलत तरीके से 40,000 करोड़ रुपए जुटाने की पेशकश की सघन जांच के बाद जारी किया है। यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू गया है। लेकिन सहारा समूह इस पर अपनी आपत्तियां 30 दिन के भीतर सेबी के पास भेज सकता है।

अपने 34 पन्नों के आदेश में सेबी ने सहारा समूह की तरफ से तथ्यों को छिपाने का पूरा ब्यौरा दिया है। उसमें समूह की तरफ से दिए गए हर कानूनी नुक्ते की काट पेश की गई है। इस आदेश को पढ़ने से एक बात और साफ होती है कि सहारा समूह ने कॉरपोरेट कार्यमंत्री सलमान खुर्शीद की आड़ लेकर सेबी को धता बताने की कोशिश की गई है। सेबी द्वारा मांगी गई जानकारी न देकर समूह की तरफ से कहा गया कि सेबी खुद कॉरपोरेट कार्यमंत्री से संपर्क करें जिनको सारे मामले की जानकारी दे दी गई है। इससे लगता है कि सहारा समूह ने खुद को बचाने के लिए सलमान खुर्शीद से भी अच्छी-खासी लॉबीइंग की होगी।

मामला उक्त दो कंपनियों की तरफ से साल 2008 में 20-20 हजार करोड़ रुपए जुटाने के लिए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास दाखिल प्रॉस्पेक्टस का है। यह रकम ओएफसीडी (ऑप्शनली फुली कनवर्टिबल डिबेंचर) के जरिए जुटाई जानी थी। प्रत्येक ओएफसीडी/बांड 5000 रुपए से 24,000 रुपए का था। सहारा समूह का कहना है कि यह रकम उसके कर्मचारियों और सगे-संबंधियों या परिचितों से प्राइवेट प्लेटमेंट के जरिए जुटाई जा रही है। इसलिए न तो यह पब्लिक इश्यू है और न ही इसके लिए सेबी से किसी तरह की इजाजत लिए जाने की जरूरत है।

सेबी की नजर में यह मामला सहारा प्राइम सिटी की तरफ से आईपीओ लाने के लिए 30 सितंबर 2009 को दाखिल ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) की जांच के दौरान आया। असल में उसके पास रोशन लाल नाम के निवेशक और प्रोफेशनल ग्रुप फॉर इनवेस्टर प्रोटेक्शन की तरफ से शिकायतें दर्ज कराई गई कि कैसे समूह की दो कंपनियां लोगों से हजारों करोड़ जुटा रही है, जिसकी कोई सूचना सहारा प्राइम सिटी ने अपने डीआरएचपी में नहीं दी है। इसके बाद सेबी ने प्रस्तावित आईपीओ के लीड मैनेजर एनम सिक्यूरिटीज को लिखित पत्र भेजकर जवाब मांगा। लेकिन उसने गोलमोल जवाब देकर टरका दिया।

सेबी ने इसी क्रम में कई बार सहारा समूह को पत्र भेजकर कहा कि वह अपनी दो कंपनियों के ओएफसीडी इश्यू में धन लगानेवाले निवेशकों का ब्योरा उसे दे दे। लेकिन समूह ने ऐसा कुछ नहीं किया और कहता रहा कि वह पूरी तरह कंपनी कानून के तहत काम कर रहा है और इश्यू के निवेशकों की संख्या 50 से कम है। इसलिए वह किसी भी तरीके से सेबी के तहत नहीं आता और उसे सेबी के सवालों का जवाब देने की जरूरत नहीं है।

लेकिन सेबी ने पूरी तहकीकात के दौरान सहारा समूह के धन के स्रोतों पर ही सवाल उठा दिया। उसका कहना है कि जमा किए सालाना खातों के अनुसार सहारा इंडिया रीयल एस्टेट ने 20,000 करोड़ की तय रकम में से 4843.37 करोड़ रुपए जुटा लिए हैं, जबकि सहारा हाउसिंग इंडिया कॉरपोरेशन द्वारा जुटाई गई रकम की जानकारी कंपनी रजिस्ट्रार को नहीं दी गई है। अगर मान लिया जाए कि इश्यू में निवेश करनेवालों की संख्या 50 से कम, मान लीजिए 49 है तो जुटाए गए 4843.37 करोड़ को ही गिनें तो प्रति निवेशक लगाई गई रकम कम से कम 98.84 करोड़ बैठती है। इतनी रकम तो किसी एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुल) श्रेणी के निवेशक के लिए भी लगाना संभव नहीं है। सेबी का कहना है कि इससे जाहिर होता है कि सहारा समूह धन के वास्तविक स्रोत को छिपा रहा है और इतनी रकम किसी भी सूरत में 50 से कम निवेशकों से नहीं जुटाई जा सकती।

सेबी ने अपने आदेश में कहा है कि 40,000 करोड़ रुपए की रकम काफी ज्यादा है। उसने याद दिलाया है कि पूरे वित्त वर्ष 2009-10 में 39 कंपनियों ने आईपीओ के जरिए कुल 24,696 करोड़ रुपए ही जुटाई थे, जबकि 2008-09 में तो 21 कंपनियां कुल 2083 करोड़ रुपए ही जुटा सकी थीं। ऐसे में सहारा समूह की दो कंपनियां अगर निवेशकों से 40,000 करोड़ जुटा रही हैं तो सेबी का फर्ज बनता है कि वह निवेशकों के हितों की हिफाजत करे। इसके मद्देनजर सेबी ने इन दो कंपनियों के ओएफसीडी इश्यू पर पाबंदी लगा दी है। उसका कहना है कि इसमें 50 के ज्यादा निवेशकों से रकम जुटाई जा रही है, इसलिए कानूनन वे पब्लिक इश्यू हैं। इनके लिए सेबी की पूर्व इजाजत जरूरी है और निवेशकों को इन डिबेंचरों को कैश कराने के लिए इनका किसी न किसी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होना भी अनिवार्य है।

1 Comment

  1. sahara india pariwar ne pure desh me bachat ki aadat dali visheshkar kam aay karane walo ke andar . aaj bahut se log aise hai thoda- thoda karake hi ek rakam jama kiye jisase na sirf apane uttardayitwon ko pura kiya balki apana vyvasay kar pragati bhi kar rahe hai . aise sansthan ko to vishesh samman milana chahiye . Sarkar ko chahiye niyam kanoon ke dayare me hi ise Protsahit kare .

Leave a Reply

Your email address will not be published.