1.40 लाख करोड़ का फटका तेल कंपनियों को!

दुनिया में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और कमजोर होते रुपए के चलते सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) की अंडर-रिकवरी चालू वित्त वर्ष 2011-12 में 1.40 लाख करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती है। यह आकलन है देश की प्रमुख रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिसर्च शाखा का। अंडर-रिकवरी का मतलब उस नुकसान से है जो ओएमसी को डीजल, रसोई गैस व कैरोसिन को सरकार निर्धारित दामों पर बेचने के चलते उठाना पड़ता है। उनका लागत मूल्य ज्यादा होता है, मगर उन्हें कम दाम पर बेचना पड़ता है।

क्रिसिल रिसर्च का कहना है कि अंडर-रिकवरी के चलते सरकारी ओएमसी की लाभप्रदता और तरलता प्रभावित हो रही है। वे नकदी या तरलता की समस्या हल कर सकें, इसके लिए सरकार की तरह से समय पर उनकी क्षतिपूर्ति करना नितांत आवश्यक है। दिक्कत यह है कि सितंबर तक 30,000 करोड़ रुपए की भरपाई करने के दावे के विपरीत सरकार ने दिसंबर तक ओएमसी को केवल 8000 करोड़ रुपए ही दिए हैं।

बता दें कि भारत सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की अपस्ट्रीम कंपनियां (ओएनजीसी, ऑयल इंडिया व गैस अथॉरिटी) और डाउनस्ट्रीम कंपनियां या ओएमसी (इंडियन ऑयल, एचपीसीएल व बीपीसीएल) हर साल तय किए जानेवाले अनुपात में अंडर-रिकवरी का बोझ आपस में बांट लेती हैं।

क्रिसिल रिसर्च का कहना है कि अंडर-रिकवरी को बांटने के 2006-07 के अनुपात को आधार बनाया जाए तो चालू वित्त वर्ष में सरकार अंडर-रिकवरी का कम से कम 50 फीसदी हिस्सा, लगभग 70,000 करोड़ रुपए ओएमसी को क्षतिपूर्ति के बतौर अदा करेगी। वहीं अपस्ट्रीम कंपनियां शायद करीब 40 फीसदी हिस्से, 56,000 करोड़ रुपए का वहन करें। हालांकि पहले वे 33 फीसदी हिस्सा देती रही हैं। ओएमसी को बाकी 14,000 करोड़ रुपए का नुकसान अपने खाते में डालना पड़ेगा। यह पिछले वित्त वर्ष 2010-11 में उनको हुए 7000 करोड़ रुपए के मार्केटिंग नुकसान का दोगुना है।

क्रिसिल रिसर्च के प्रमुख श्रीधर चंद्रशेखर का कहना है, “बढ़ती अंडर-रिकवरी ओएमसी को उनके इतिहास में पहली बार घाटे में धकेल सकती हैं क्योंकि रिफाइनिंग के धंधे में उनका सिकुड़ता लाभ मार्केटिंग नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। 2011-12 की पहली छमाही में ओएमसी का रिफाइनिंग मार्जिन 2.2 डॉलर प्रति बैरल रह गया है, जबकि 2010-11 की पहली छमाही में यह 4.1 डॉलर प्रति बैरल था। इस हिसाब से 2011-12 में उनका रिफाइनिंग लाभ 25 से 30 फीसदी घटकर 12-13,000 करोड़ रुपए पर आ सकता है।”

इधर, अंडर-रिकवरी के चलते तेल कंपनियों के पास नकदी की तंगी होने लगी है। सरकार ने वादा किया था कि वह सितंबर 2011 तक उनको 30,000 करोड़ रुपए दे देगी। लेकिन 31 दिसंबर तक उसने केवल 8000 करोड़ रुपए ही जारी किए हैं। नतीजतन, तेल कंपनियों को कार्यशील पूंजी जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार से छोटी अवधि के ऋण उठाने पड़ रहे हैं। अगर सरकार अगले तीन महीनों में इन कंपनियों को 35-40,000 करोड़ रुपए दे भी देती है, तब भी उनके सामने ज्यादा उधार लेने की मजबूरी बनी रहेगी।

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