इस समय केंद्र में सत्तारूढ़ दल पर जनधन को लूटने की अंधी हवस सवार है। वो बड़े राज्यों ही नहीं, छोटे राज्यों व केंद्र-शासित क्षेत्रों तक में येन-केन प्रकारेण सरकार बनाने में लगी रहती है। जहां धार्मिक ध्रुवीकरण या धांधली व गुंडागर्दी से चुनकर सत्ता में नहीं आती, वहां विधायकों की खरीद-फरोख्त से सरकार बना लेती है। लेकिन उसका यह राजनीतिक चरित्र देश की अर्थनीति के लिए घातक बनता जा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था इस समयऔरऔर भी

इस सरकार के चरित्र के दो खास पहलू हैं जो इसके 11 साल के कार्यकाल में दिन के उजाले की तरह साफ हो चुके हैं। एक, यह कॉरपोरेट क्षेत्र और उसमें भी अपने प्रिय चुनिंदा बड़े समूहों का अहित कभी नहीं करेगी। दो, सरकार अपना मनमाना खर्च चलाते रहने के लिए टैक्स संग्रह को कभी घटने नहीं देगी। हालांकि वो आईएमएफ व विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं को खुश रखने के लिए ऋण पर अंकुश लगा सकतीऔरऔर भी

सरकारें हमेशा यह छिपाने में लगी रहती हैं कि वे जनता की सेवा का नारा देकर असल में किसके लिए काम कर रही हैं। लोकतंत्र में विपक्ष, मीडिया व जागरूक अवाम का काम है कि वो हमेशा सरकार की असलियत उजागर करता रहे। विपक्ष अवसरवादी और मीडिया सरकार की गोद में जा बैठा हो तो सारा का सारा दायित्व जागरूक अवाम पर आ जाता है। सरकार के असली चेहरे व चरित्र को समझने के लिए बजट सेऔरऔर भी

बचपन में मां एक पहेली पूछा करती थी। गुरु गुरुआइन नब्बे चेला, तीन गो रोटी में कैसे होला? हम लोग नहीं बता पाते तो मां बताती कि असल में चेले का नाम ही नब्बे था। इस बार के बजट में वित्त मंत्री नम्मो ताई ने भी कुछ ऐसी ही पहेली पूछ ली है, जिसका कोई जवाब नहीं सूझ रहा। उन्होंने ऐसा प्रावधान किया है जिससे 12 लाख रुपए तक सालाना आय वालों को कोई इनकम टैक्स नहींऔरऔर भी

हमेशा ध्यान रखें कि जिन भी 15-20-25 कंपनियों में निवेश कर रखा है, उनमें या दूसरे शब्दों में पोर्टफोलियो में कोई कमज़ोर कंपनी न हो। फिर बाज़ार कितना भी गिरता जाए, चिंता की बात नहीं। मूलभूत रूप से मजबूत कंपनियों के शेयर गिर जाएं तो उन्हें और ज्यादा खरीदते जाएं। गिरते बाज़ार का लाभ उठाने का यही तरीका है। गिरावट के माहौल में घबराकर बेचने लगे तो भविष्य में बहुत पछताएंगे। सोशल मीडिया के ‘विद्वानों’ को ज़रा-सीऔरऔर भी