खास लोगों की बात अलग है। सांसद-विधायक एक बार में इतना कमा लेते हैं कि सात पुश्तों का इंतज़ाम। ऊपर से ताजिंदगी भरपूर पेंशन। सरकारी कर्मचारियों को बराबर महंगाई भत्ता। लेकिन हमारे-आप जैसे आम आदमी की कमाई कभी महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ती। बीस साल में देशी घी ₹150 से ₹600 किलो और 10 ग्राम सोना ₹6000 से ₹60,000 का हो गया। लेकिन हमारी कमाई भी क्या इसी रफ्तार से बढ़ी? जो खा-पी लिया, पहन-ओढ़ लिया,औरऔर भी

ताज़ा खबर यह है कि चीन भारत की सीमा पर पिछले पांच सालों से जो 628 गांव बना रहा था, उनमें उसने अपने लोगों को बसाना शुरू कर दिया। इससे पहले वो जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में हमारी लगभग 800 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर चुका है। लेकिन एक सच्चाई जो कभी खबर नहीं बनी, वो यह है कि आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक-इन इंडिया’ के नारों के बीच औद्योगिक इनपुट के लिए चीनऔरऔर भी

देश में आर्थिक विकास की उलटबांसी चल रही है। खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि में हमारी 44.1% श्रमशक्ति को रोजगार मिला हुआ था और मैन्यूफैक्चरिंग में 12.1% को। वित्त वर्ष 2021-22 तक विकास की ऐसी कर्मनाशा बही कि कृषि में लगी श्रमशक्ति बढ़कर 45.5% और मैन्यूफैक्चरिंग में घटकर 11.6% हो गई। श्रमशक्ति से बाहर निकलकर देखें तो देश की 60-70% आबादी अब भी किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भरऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिम बजट को समावेशी व इनोवेटिव बताया है। मगर यह न तो समोवेशी है और न ही इनोवेटिव। जिस विकास में रोज़गार ही नहीं बन रहा, वो समावेशी कैसे हो सकता है? खुद सरकार के आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार देश में नियमित वेतन वाला रोज़गार पांच साल से ठहरा हुआ है। अधिकांश रोजगार जो बना है, वो अवैतनिक पारिवारिक श्रम या प्रछन्न बेरोज़गारी है। कृषि में वास्तविक मजदूरी घटी है।औरऔर भी