भाव कोई भगवान नहीं तय करता। शेयर बाज़ार में भाव वही होते हैं जो ट्रेडर देने को तैयार होते हैं। इस समय निफ्टी फ्यूचर्स का भाव स्पॉट से बहुत मामूली प्रीमियम या डिस्काउंट तक पर इसलिए चल रहा है क्योंकि फ्यूचर्स में हर दिन मार्क-टू-मार्केट का सिस्टम है और ट्रेडर मार्क-टू-मार्केट घाटा उठाने की न तो स्थिति में हैं और न ही इसके लिए तैयार हैं। वे बहुत हाथ-पैर मार रहे हैं। लेकिन इस दुर्दशा से निकलनेऔरऔर भी

निफ्टी फ्यूचर्स का साथ इधर समस्या यह चल रही है कि निफ्टी के स्पॉट भाव से वह बेहद मामूली प्रीमियम पर रहता है और बहुत बार तो डिस्काउंट या नीचे चला जाता है। इस डिस्काउंट का सीधा-सा मतलब यह हुआ कि ट्रेडर निफ्टी के बढ़ने की गुंजाइश नहीं देख रहे तो उसके फ्यूचर्स कम भाव पर बेचने को तैयार हैं। यह बाज़ार के लिए बेहद दुखद और अफसोसनाक है। मंदी की धारणा ने उनको ऐसा जकड़ लियाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के आम ट्रेडर परेशान हैं, ऑप्शंस ट्रेडर हैरान हैं तो फ्यूचर्स ट्रेडर भी कोई कम हैरान-परेशान नहीं। वे तो बेहद जटिल, अनोखी व गंभीर चुनौती झेल रहे है। ऐसी पहेली जिससे हम अक्सर रू-ब-रू नहीं होते। जब सरकारी बॉन्डों की यील्ड यानी रिस्क-फ्री ब्याज दर बढ़ रही हो, तब ऑप्शंस के साथ ही फ्यूचर्स का प्रीमियम बढ़ जाना चाहिए क्योंकि तब सौदे को कैरी करने की लागत बढ़ जाती है। प्रीमियम का सीधा रिश्ता उसऔरऔर भी

इन दिनों इंट्रा-डे ट्रेडर खुश हैं क्योंकि वे लहरों की उछलकूद से अच्छा कमा सकते हैं। निफ्टी-50 अक्सर दिन भर में 50-100 नहीं, बल्कि 150-200 अंक से ज्यादा के दायरे में नीचे-ऊपर होता है। लेकिन कम पूंजी लेकर निफ्टी ऑप्शंस पर दांव लगानेवाले बड़े व्यथित हैं। मालूम हो कि ऑप्शंस साधारण बीमा की तरह हैं जिनकी मीयाद के दौरान आपने इस्तेमाल कर लिया तो ठीक, नहीं तो मीयाद खत्म होने पर उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता।औरऔर भी

शेयर बाज़ार में इधर एक खास पैटर्न दिख रहा है। कुछ दिन गिरने के बाद अचानक एकाध दिन वो बढ़ जाता है। लेकिन उसके बाद फिर कई दिनों तक गिरता जाता है। एडवांस-डिक्लाइन अनुपात किसी दिन चढ़ जाता है। फिर कई दिन तक नीचे डूबता जाता है। इसकी खास वजह है कि शेयरों को चढ़ाने के लिए धन का जो सतत प्रवाह चाहिए, वह अभी तक सूखता गया और आगे भी सटोरिया खरीद के लिए ज़रूरी धनऔरऔर भी

डेरिवेटिव सौदों का सच यह है कि हमारा शेयर बाज़ार अक्टूबर 2021 में जब शिखर पर था, तब निफ्टी फ्यूचर्स की लॉन्ग पोजिशन को कोई जून माह तक रोलओवर करे तो बाज़ार 20% से भी ज्यादा गिर चुका है। हालत यह है कि निफ्टी के स्पॉट या कैश सेगमेंट के भाव से जुलाई का निफ्टी फ्यूचर्स मात्र 0.14%, अगस्त का निफ्टी फ्यूचर्स मात्र 0.34% और सितंबर का निफ्टी फ्यूचर्स मात्र 0.62% ऊपर या प्रीमियम पर है। यहऔरऔर भी

क्या सौ साल से ज्यादा पुराने शेयर बाज़ार के डाउ सिद्धांत को अब भी सही माना जा सकता है? यकीनन माना जा सकता है, लेकिन हू-ब-हू नहीं। 1704 में लाया गया न्यूटन का सिद्धांत इसलिए नहीं गलत हो जाता कि वह पांच सौ साल से ज्यादा पुराना है। लेकिन उसे आइंसटाइन से लेकर मैक्स प्लांक तक के सिद्धांत से मिलाकर लागू किया जाता है। डाउ सिद्धांत जब आया था, तब शेयर बाज़ार में सारे सौदे स्पॉट याऔरऔर भी

क्या हमारा शेयर बाज़ार सालों की तेज़ी के बाद अब मंदी की गिरफ्त में आ चुका है? डाउ सिद्धांत कहता है कि बाज़ार अपने शिखर से 20% गिर जाए तो मंदी का दौर आज जाता है। निफ्टी-50 सूचकांक का ऐतिहासिक शिखर 19 अक्टूबर 2021 को 18,604.45 का है, जबकि 52 हफ्तों का न्यूनतम स्तर 17 जून 2022 को दर्ज 15,183.40 का है। अभी यह सूचकांक 15,752.05 पर है, ऐतिहासिक शिखर से 15.33% नीचे। यह शिखर से 20%औरऔर भी

कमज़ोर होते रुपए से ऐसी तमाम कंपनियों पर नकारात्मक असर पड़ रहा जो कच्चा माल विदेश से आयात करती हैं या बाहर से अंतिम उत्पाद मंगाकर घरेलू बाज़ार में बेचती हैं। बाहर से कच्चा हीरा मंगाकर उसे तराशने व चमकाने के बाद निर्यात कर देनेवाली कंपनियों पर खास असर नहीं पड़ हा। लेकिन रसायन या दवाओं के अवयव आयात करनेवाली कंपनियों का धंधा मंदा पड़ता जा रहा है। यूपीएल जैसी मजबूत कंपनी का शेयर यूं ही नहींऔरऔर भी

बढ़ता ब्याज और डॉलर के मुकाबले फिसलता रुपया हमारी बहुतेरी कंपनियों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। ब्याज बढ़ने से सबसे पहले प्रभावित हो रहे हैं बैंक और गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां या एनबीएफसी। बैंक पब्लिक से बचत खातों या एफडी वगैरह से ही धन जुटाकर धंधा करते हैं। यह धन उनका कच्चा माल है जो  अब महंगा हो गया है क्योंकि पब्लिक को उन्हें अधिक ब्याज देना पड़ रहा है। एनबीएफसी बैंकों से ही उधार लेकरऔरऔर भी