हर स्टॉक के पीछे कोई न कोई कंपनी होती है। उसके भाव लम्बे समय में और कभी-कभी छोटी अवधि में भी कंपनी की खबरों और उसके फंडामेंटल्स से प्रभावित होते हैं। लेकिन हर स्टॉक का अपना अलग स्वभाव होता है। उसका यह स्वभाव उसमें सक्रिय ट्रेडरों व निवेशकों की मानसिकता से तय होता है। किसी शेयर पर हर दिन अक्सर सुबह गरमी छाई रहती है और शाम होते-होते उतर जाती है। वहीं कुछ स्टॉक्स दो बजे केऔरऔर भी

मत भूलें कि शेयर बाज़ार किसी का धंधा है। बीएसई, एनएसई, एनएसडीएल, सीडीएसएल, ब्रोकरेज़ हाउस। यहां तक कि हमारे हर सौदे पर पूंजी बाज़ार नियामक सेबी का आधिकारिक कट और केंद्र सरकार का टैक्स होता है। हम यहां सौदा करते हैं तो इन सबका धंधा चलता है। ऐसा धंधा जिसमें नुकसान नहीं, फायदा ही फायदा है। फिजिक्स में हम पढ़ते हैं कि सौ सीढ़ी चढ़े और सौ सीढ़ी उतर गए तो कुल मिलाकर किया गया कार्य शून्यऔरऔर भी

आखिर भारत का सोया हुआ मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र कब जाएगा? हमारा देश अमेरिका, जापान व चीन के बाद कब दुनिया की फैक्टरी बनने जा रहा है? जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा अपने यहां 10-12 साल से 14-16% पर अटका हुआ है। वहीं, एशिया के अन्य देशों – बांग्लादेश में यह 21.2%, वियतनाम में 24.6%, दक्षिण कोरिया में 25.5%, थाईलैंड में 27% और चीन में 27.4% पर पहुंच चुका है। पहले हमारे यहां भी लक्ष्य था कि साल 2025औरऔर भी

बैंकिंग, फाइनेंस व सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था की शानपट्टी हैं, जबकि मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र रीढ़ की हड्डी और असली कलेवर है। इसी के दम पर शेयर बाज़ार लम्बे समय तक लगातार अच्छा रिटर्न देता है। लेकिन अपने यहां तमाम दावों के बावजूद मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की हालत कमज़ोर है। दिसंबर 2014 में भारत सरकार और उद्योग के शीर्ष नुमाइंदों ने लम्बी बहस के बाद एक्शन प्लान बनाया था कि साल 2025 तक देश के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का योगदान 25%औरऔर भी

शेयर बाज़ार कुलांचे मार रहा है। निफ्टी व सेंसेक्स रह-रहकर नई-नई ऊंचाई छूते जा रहे हैं। रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2023-24 में हमारे जीडीपी के 6.5% और महीने भऱ पहले बीती जून तिमाही में 8% बढ़ने का अनुमान लगाया है जिसका आधिकारिक आंकड़ा 31 अगस्त को आएगा। इस बीच कंपनियों के जून तिमाही के नतीजे आते जा रहे हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा अब तक घोषित 281 कंपनियों के नतीजों के विश्लेषण से पता चलाऔरऔर भी

शेयर बाजार के बढ़ने का देश में गरीबी या बेरोज़गारी से कोई ताल्लुक नहीं है। उसका खास रिश्ता देश के जीडीपी और उसमें भी मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के विकास से होता है। बैंकों की बैलेंस शीट पुराने ऋणों को राइट-ऑफ और एनपीए को एनकेन प्रकारेण घटाकर चमका दी गई है। यह भी सच है कि इधर कई सालों से सरकार का ज़ोर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, रेलवे और डिफेंस क्षेत्र को मजबूत करने पर है। इंजीनियरिंग व कंस्ट्रक्शन केऔरऔर भी

भारत विपुल संभावनाओं से भरा देश है। आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी। हमने अभी तक जो हासिल किया है, वह हमारी अंतर्निहित सामर्थ्य से बहुत-बहुत कम है। लेकिन पूर्णता पाने के लिए सच को आधार बनाना और जिस झूठ ने हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन को दबोच रखा है, उसे जड़ से मिटा देना ज़रूरी है। असल में, कोई भी विकास सच को आधार बनाकर ही किया जाता है।औरऔर भी

मानते हैं कि अर्थव्यवस्था या जीडीपी के बढ़ने और शेयर बाज़ार के चढ़ने में सीधा रिश्ता है। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं दिखती। चीन का जीडीपी जब जमकर बढ़ रहा था, तब वहां का शेयर बाज़ार धीमी गति से चल रहा था। भारत के जीडीपी के विकास दर जब ज्यादा चल रही थी, तब सुस्त गति से बढ़ते अमेरिका के शेयर बाज़ार ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारत से कहीं ज्यादा रिटर्न दिया था। इस समय भी जब हमाराऔरऔर भी

बीते वित्त वर्ष 2022-23 के मुनाफे/ईपीएस को आधार बनाएं तो सेंसेक्स अभी 25.41 और निफ्टी 23.97 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। निफ्टी-50 में शामिल कंपनियों का शुद्ध लाभ अगले दो साल में 13% की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ता है तो उसका फॉरवर्ड पी/ई घटकर 19 के आसपास आ जाता है। इसलिए कुछ जानकार बाज़ार को सस्ता बता सकते हैं। लेकिन सब कुछ मन का धन है। कंपनियों का मुनाफा ठहरा रहता है, तबऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय सभी लोगों का सम्मिलित मनोविज्ञान शेयरों के भाव और शीर्ष सूचकांकों में झलकता है। इन लोगों में देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों के फंड मैनेजर, हाई नेटवर्थ व्यक्ति (एचएनआई), प्रोफेशनल ट्रेडर और सुलझे हुए धनवान निवेशक तक शामिल हैं। इन सबका आत्मविश्वास, आशावाद व सकारात्मक नज़रिया जब हद से पार चला जाता है तो बाज़ार में अतिशय लालच और निश्चिंतता का सुरूर चढ़ जाता है। सकारात्मक तत्व नकारात्मक हालात पैदा कर देते हैं। इतिहास गवाहऔरऔर भी