आईएमएफ या अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के 80 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब उसे आधिकारिक रूप से अपने किसी कार्यकारी निदेशक के बयान से पल्ला झाड़ना पड़ा। हुआ यह कि आईएमएफ के कार्यकारी निदेशक कृष्णमूर्ति सुब्रमणियन ने नई दिल्ली में 28 मार्च को एक आयोजन में ऐलानिया कहा कि भारत ने पिछले दस सालों में जो नीतियां अपनाई हैं, उससे वो 2047 तक सालाना 8% की विकास दर से बढ़ सकता है। इसके हफ्तेऔरऔर भी

चालू वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.5% लेकर 7% की दर से बढ़ सकती है और वो दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। लेकिन इसके पीछे का मुख्य कारक भारत की आबादी और बाज़ार का काफी बड़ा होना है। माकूल नीतियों और आंतरिक ताकत की बात करें तो सारी शान-पट्टी के बावजूद भारत की प्रति व्यक्ति आय जी-20 के देशों में सबसे कम है। विश्व बैंक के मुताबिक भारत की प्रतिऔरऔर भी

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्य़ाशी नरेंद्र मोदी साल 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले बढ़-चढ़कर दावा करते थे कि सत्ता में आने पर रोजगार के अवसरों की बाढ़ ला देंगे। तब हर तरफ खबरें आती थी कि भारत में हर साल एक से डेढ़ करोड़ नए नौजवान रोजगार की लाइन में लग जाते हैं। मोदी ने दो कदम आगे बढकर कहा था कि वे अपनी सरकार बनने पर हर साल दो करोड़औरऔर भी

देश के आम ही नहीं, अधिकांश खास लोग भी मानते हैं कि इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी है और 4 जून को आम चुनावों के नतीजों के बाद जो नई सरकार बनेगी, उसके सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बेरोज़गारी ही रहेगी। यह निष्कर्ष है प्रमुख समाचार एजेंसी रॉयटर्स द्वारा बड़े राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्रियों के बीच किए गए सर्वे का। रॉयटर्स ने 16 अप्रैल से 23 अप्रैल के बीच ऐसे 26 अर्थशास्त्रियोंऔरऔर भी

चुनावी लोकतंत्र की राजनीति में झूठ से सत्ता हासिल की जा सकती है क्योंकि जनता की याददाश्त लम्बी नहीं होती और भारत जैसे आस्था-प्रधान देश में लोगों को आसानी से भावनाओं में बहकाया जा सकता है। हालांकि यहां भी काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती। लेकिन अर्थनीति में झूठे दावे देश की आर्थिक बुनियाद को ही खोखला कर सकते हैं और सच उजागर होने पर सबसे तेज़ गति से बढ़ती हमारी अर्थव्यवस्था भी धराशाई हो सकती है।औरऔर भी

कई महीनों से बैंकों से उधार लेनेवाले बढ़ रहे हैं, जबकि बैंकों में डिपॉजिट कम गति से बढ़ रही है। क्रेडिटयेज़ रेटिंग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 22 मार्च 2024 को खत्म पखवाड़े में बैंकों द्वारा दिए गए उधार 20.2% बढ़कर ₹164.3 लाख करोड़ हो गए, जबकि बैंकों की जमा 13.5% ही बढ़कर ₹204.8 लाख करोड़ पर पहुंच सकी। उसके बाद रिजर्व बैंक के सबसे ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डालें तो 5 अप्रैल को खत्म पखवाड़े मेंऔरऔर भी

भारतीय बैंक इस समय 20 सालों की सबसे विकट डिपॉजिट समस्या से जूझ रहे हैं। इस समय क्रेडिट-डिपॉजिट या सीडी अनुपात 80% हो चुका है जो साल 2005 के बाद से अब तक का उच्चतम स्तर है। सीडी अनुपात दिखाता है कि बैंकों का कितना डिपॉजिट ऋण देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारे बैंक बीते वित्त वर्ष 2023-24 में डिपॉजिट खींचने के लिए जूझते रहे। हालत यह है कि लोगबाग होम लोन से लेकरऔरऔर भी

प्रधानमंत्री के पद पर बैठा कोई शख्स आर्थिक मसलों पर झूठ बोलने लग जाए तो तीन साल में भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और 2047 तक विकसित देश बनाने का संकल्प महज चुनावी झांसा व जुमला लगने लगता है। निवेश को ट्रैक करनेवाली फर्म प्रोजेक्ट्स टुडे के ताज़ा डेटा के मुताबिक मार्च में खत्म हुए वित्त वर्ष 2023-24 में भारत में निजी क्षेत्र का निवेश 15.3% घटा है। निजी क्षेत्र की निवेश योजनाओं में सबसेऔरऔर भी

झांकियां गणतंत्र दिवस के परेड में शोभा देती हैं, देश के आर्थिक विकास में नहीं। लेकिन मोदी सरकार ने पिछले दस साल में आर्थिक विकास के मामले में केवल झांकियों से काम चलाया है। दिक्कत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार में भी झांकियां दिखाने से बाज़ नहीं आ रहे। उन्होंने शनिवार को एक जनसभा में कहा कि भारत में रिकॉर्ड निवेश आ रहा है। इसमें देशी और विदेशी निवेश दोनों शामिल है। प्रधानमंत्री मोदीऔरऔर भी

देश में बेरोज़गारों की संख्या बहुत है। छिपी हुई बेरोज़गारी उससे भी ज्यादा है। श्रमशक्ति की भागीदारी बहुत कम है। महिला श्रमशक्ति की भागादारी तो बेहद कम है। जीडीपी में कृषि का हिस्सा महज 14% है, लेकिन देश का तकरीबन 50% रोज़गार उसी में मिला हुआ है। जब तक कृषि से निकालकर लोगों को उद्योग-धंधों में नहीं लगाया जाएगा, तब तक हमारी अर्थव्यवस्था का विकास इतना नहीं हो सकता कि हम 2047 तक विकसित देश बन जाएं।औरऔर भी