जो जीता, वही सिकंदर। लेकिन क्या चुनावों में जो जीत रहा है, वही सही है? यह भी कि क्या आंकड़ों में जीडीपी का बढ़ जाना ही अर्थव्यवस्था के बढ़ जाने और विकास का प्रमाण है? फिर जो प्रत्यक्ष दिख रहा है, क्या वो सरासर मनगढ़ंत, दुष्प्रचार और झूठ है? पिछले बारह साल से हम 140 करोड़ देशवासियों को बताया जा रहा है कि हेडलाइंस पर भरोसा करो। भारत दुनिया की सबसे तेज़ रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था है।औरऔर भी

ठगों का गिरोह अंततः भोले-भाले लोगों को झूठ पिलाने में सफल हो गया। गोएबल्स के हज़ारों बार बोले गए झूठ को अंततः सभी ने सच मान लिया। अब तो आम लोग ही नहीं, बड़े-बड़े विद्वान और मोदी सरकार के राजनीतिक विरोधी भी मान बैठे हैं कि भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और जल्दी ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसलिए लोककभा में जब भाजपा सांसद निशिकांत दुबे कहते हैं कि भारत कीऔरऔर भी

हमारे विशाल देश भारत में रोज़गार की समस्या विकट सच्चाई है। इसे सुलझाना विकास की किसी भी रणनीति के केंद्र में होना चाहिए। लेकिन 2047 तक विकसित भारत का नारा उछाल रही मोदी सरकार इसे महज जुमले या हवाबाज़ी से हल करने का स्वांग रच रही है। हमारी आबादी की मीडियन या मध्यमान आयु मात्र 28 साल है। हमें यह भी समझना होगा कि लोग सरकार से नौकरियां नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां चाहते हैं जिनसे रोज़ी-रोज़गार केऔरऔर भी

भारत जैसी युवा आबादी से लबालब भरे देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन न जाने क्यों मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी को एक निगाह से नहीं देखते। उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण में 2011 से लेकर अब तक की मुद्रास्फीति का सालाना डेटा देकर बताया है कि कैसे मुद्रास्फीति बराबर घटती रही है। लेकिन वो बेरोजगारी का ऐसा कोई डेटा नहीं देते। अगर इन्हीं 15 सालों के दौरान रही बेरोज़गारी का डेटा दे देते तो यह सच उजागर होऔरऔर भी

हमारी सरकार और उसमें ऊंचे पदों पर बैठे नीति-नियामक किसके लिए नीतियां बनाते हैं, यह इसी बात से साफ हो जाता है कि वे समय-समय पर अर्थव्यवस्था को लेकर जब भी घोषणाएं करते हैं, उसमें बेरोज़गारी का जिक्र भूल-चूक से भी नहीं होता। हालांकि प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के लिए आजकल विकसित भारत और रोज़गार हर कार्यक्रम में लगाया जानेवाला तड़का बन गया है। पहली अप्रैल से शुरू हो रही नई जनगणना केऔरऔर भी

जीडीपी की नई सीरीज़ में केवल आधार वर्ष 2011-12 से बढ़ाकर 2022-23 ही नहीं किया गया है, बल्कि इसमें बेहद बारीक स्तर पर करीब 600 डिफ्लेटर इस्तेमाल किए गए हैं, जबकि पिछली सीरीज़ में मोटे तौर पर ऐसे 180 डिफ्लेटर इस्तेमाल किए जा रहे थे। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का कहना है कि इसमें आगे सेवा क्षेत्र के डिफ्लेटर भी जोड़ लिए जाएंगे। लेकिन दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

देश में 1991 के आर्थिक उदारवाद की शुरुआत के तीन-चार साल बाद ही कुछ जन-पक्षधर अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि जीडीपी की गणना में कितने भी डिफ्लेटर शामिल कर लिए जाएं और मुद्रास्फीति के प्रभाव को खत्म कर लिया जाए, लेकिन चूंकि वो उत्पादन पर ही ज्यादा फोकस करता है, इसलिए अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर नहीं पेश करता। उनका कहना था कि जीडीपी की गणना में उत्पादन और मुद्रास्फीति जितना ही महत्व बेरोज़गारी की स्थिति को दियाऔरऔर भी

विकासशील देश में सरकार का एजेंडा विकास ही हो सकता है। लेकिन किसका विकास? लोकतांत्रिक देश में सरकार और जनता के एजेंडे में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। भारत तो दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है। सालों-साल से बखाना जा रहा है कि हमारी 65% आबादी 35 साल से नीचे की है। इसे हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड भी कहा जाता है। आखिर फिर क्यों हमारे आर्थिक विकास के केंद्र में नौजवान और उसका रोज़गार नहींऔरऔर भी

आज की तारीख बड़ी अहम है। ठीक 95 साल पहले 23 मार्च 1931 को 23-23 साल के ही तीन नौजवानों भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु ने ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाकर भारत का सुंदर भविष्य बनाने के लिए सरकार से माफी मांगने के बजाय फांसी पर चढ़ना कुबूल किया था। भगत सिंह ने फांसी पर चढ़ने के ठीक पहले देशवासियों को एक ही संदेश दिया: साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, इंकलाब ज़िंदाबाद। फांसी के ठीक पहले तीनों नेऔरऔर भी

कोई देखता नहीं, कोई पूछता नहीं तो सरकार कुछ भी बोलकर चली जाती है। देश में रेअर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) बनाने की ₹7280 करोड़ की नई स्कीम में सात साल के भीतर 6000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट प्रतिवर्ष बनाने के लिए पूंजी व प्रोत्साहन दिए जाएंगे। हकीकत यह है कि देश में इस समय सालाना 7000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट की खपत होती है। अगर नई स्कीम सफल भी हो गई और साल 2030 तक देशऔरऔर भी