उद्योग-धंधों में लगी कंपनियां पूंजी निवेश करने के बजाय अपने कैश पर कुंडली मारकर बैठी हैं, जबकि केंद्र सरकार हल्ला मचाने के बावजूद ज्यादा खर्च नहीं कर रही तो देश की सरप्लस पूंजी जा कहां रही है? अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की अध्ययन रिपोर्ट में छानबीन करके बताया गया है कि यह सरप्लस पूंजी फाइनेंशियल या वित्तीय बाज़ारों में जा रही है। भारत में वित्तीय सक्रियता कमाई व दौलत का प्राथमिक स्रोत बन गई है और उसने औद्योगिक उत्पादन को पीछे छोड़ दिया है। इसे ही अर्थव्यवस्था का वित्तीयकरण कहा जाता है। यह उल्टी रीत है। दुनिया भर में अमूमन पहले अर्थव्यवस्था का औद्योगिकीकरण होता है। मसलन, अमेरिका में पहले मैन्यूफैक्चरिंग का आधार बना। उसी के बाद वहां का पूंजी बाज़ार विकसित होता रहा। लेकिन अपने यहां बिना किसी मजबूत औद्योगिक आधार के ही वित्तीय बाज़ार कुलांचे मारने लगा। खुद केंद्र सरकार कैसे हाथ बांधती जा रही है, इसका पता प्राथमिक घाटे से चलता है। प्राथमिक घाटा हर साल की ब्याज अदायगी के बाद उधार लिये गए धन का वो हिस्सा है जो सरकार देशहित में खर्च करती है। देश का प्राथमिक घाटा वित्त वर्ष 2020-21 में जीडीपी का 5.7% हुआ करता था। यह महज पांच साल बाद 2025-26 में घटकर जीडीपी का 0.8% रह गया। चालू वित्त वर्ष 2026-27 में इसे घटाकर 0.7% कर दिया गया। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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