अमेरिका के डाउ जोंस सूचकांक मे 600 अंकों की भारी गिरावट ने आखिरकार भारत व एशिया में आई गिरावट की बराबरी कर दी। भारत का बाजार पिछले दस महीनों से गिर रहा था, जबकि डाउ जोंस खुद को मजबूती से 12300 पर टिकाए हुए था। लेकिन अब उसे असली झटका लग चुका है। असल में विकसित देशों को लौटकर गया धन अब वहां से निकलकर फिर से भारत उभरते बाजारों की तरफ बढ़ रहा है। खैर, हमारेऔरऔर भी

अमेरिका का डाउनग्रेड होना चाहिए था या नहीं, यह अब बहस का नहीं, इतिहास का मसला बन चुका है क्योंकि एस एंड पी उसकी संप्रभु रेटिंग को डाउनग्रेड कर एएए से एए+ पर ला चुकी है। हो सकता है कि एएए रेटिंग वाले दूसरे देशों को भी बहुत जल्द ही डाउनग्रेड कर दिया जाए। लेकिन क्या इस तरह के डाउनग्रेड से सब कुछ खत्म हो जाता है? ऐसा कतई नहीं है। दुनिया और बाजार चलते रहे हैं,औरऔर भी

साल 2008 और 2009 में बाजार लेहमान संकट की भेंट चढ़ गया। अब 2011 पर यूरोप व अमेरिका का ऋण संकट मंडरा रहा है। अमेरिका की आर्थिक विकास दर के अनुमान को घटाकर 1 फीसदी कर दिया गया है। अमेरिका के इतिहास में यह भी पहली बार हुआ कि स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने शनिवार को उसकी रेटिंग एएए के सर्वोच्च स्तर से घटाकर एए+ कर दी और आगे एए भी कर सकती है। हालांकि अमेरिकी वित्त मंत्रालयऔरऔर भी

अमेरिका में मचा बवाल, डाउ जोंस का 512 अंक गिरना, एशियाई बाजारों को लगी चपत और यूरोप की अस्पष्टता अपने साथ भारतीय बाजार को भी बहा ले गई। वैसे, मंदडियों का समुदाय आज सबसे ज्यादा मौज में रहा होगा, बशर्ते उन्होंने पर्याप्त शॉर्ट सौदे कर रखे होंगे। लेकिन यह काफी मुश्किल लगता है क्योंकि बाजार में शॉर्ट सेलिंग के महारथी व जिगर वाले ट्रेडर मुठ्ठी भर ही हैं। उनके कौशल को मैं सलाम करता हूं क्योंकि मैंऔरऔर भी

कितने लोग जानते हैं कि टीटीके प्रेस्टिज को हमने पांच साल पहले 90 रुपए पर खरीदने की सलाह दी थी। हफ्ते भर पहले यह 3200 रुपए पर था। इस स्टॉक को फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफ एंड ओ) में रखे जाने की कोई जरूरत नहीं थी। फिर भी इसे एफ एंड ओ में डाल दिया गया और मंदड़िए अब इसे अपना आसान शिकार बनाएंगे। जिनके पास भी यह स्टॉक बड़ी मात्रा में हैं, उन्होंने डिलीवरी के एवज मेंऔरऔर भी

अमेरिका में ऋण-सीमा बढ़ाने का मुद्दा अब इतिहास बन चुका है। मूडीज ने बिना रेटिंग बदले अमेरिका को डाउनग्रेड कर दिया है। नतीजतन अमेरिकी बाजार कल धड़ाम हो गए। यह सब तो निपट गया। अब आगे क्या? अब आप अमेरिकी बाजार को लेकर क्या बहस करेंगे? क्या आप अब भी भारत में बेचते रहेंगे क्योंकि कौन जानता है कि अमेरिका का अगला डाउनग्रेड तीन महीने बाद ही हो जाए? ध्यान रखें कि अमेरिकी बाजार में भरपूर लोचऔरऔर भी

बाजार में पहले से छाए पस्ती के आलम को और हवा तब मिल गई, जब अमेरिकी ऋण संकट के समाधान के बावजूद एशिया के बाजार गिर गए। मंदड़ियों का खेमा मान बैठा है कि अमेरिका में हुआ राजनीतिक समझौता तात्कालिक समाधान है। इसलिए इस पर चहकने की कोई जरूरत नहीं है। बाजार फिर से 5500 के नीचे चला गया तो उन्होंने फिर से बिक्री का बटन दबा दिया है। फिर वही बात उठा ली है कि अबऔरऔर भी

तीन साल पुराने लेहमान ब्रदर्स के प्रेत ने हमारे निवेशकों व ट्रेडरों के मन को अभी तक अवांछित नकारात्मकता से भर रखा है। अमेरिका के ऋण संकट को यहां इतनी संजीदगी से देखा जा रहा था जैसे भारत व एशिया के निवेशकों ने ही अमेरिका को सारा उधार दे रखा हो और कोई भी संभावित डिफॉल्ट उनका धन स्वाहा कर देगा। यह निराशावाद की इंतिहा है और मेरी राय में अगर कोई निवेशक जोखिम नहीं उठा सकताऔरऔर भी

एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम ने हमें ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया है जहां से गिरावट की गहरी फिसलन का अंदेशा बढ़ गया है। ग्रीस के ऋण संकट को हमने कभी तवज्जो नहीं दी। लेकिन अमेरिका में अगर ऋण अदायगी में चूक हुई तो अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज उसे डाउनग्रेड कर सकती है। इससे अमेरिकी शेयर बाजार में 10 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है और यकीनन इससे भारतीय शेयर बाजार का सारा मिजाज भीऔरऔर भी

निफ्टी और सेंसेक्स दोनों लगभग सपाट। लेकिन बाजार में छाई निराशा का कोई अंत नहीं है। ट्रेडर हलकान हैं। निवेशक अपनी गाढ़ी कमाई को लेकर परेशान हैं। वे तमाम ऐसी कंपनियों में कसकर फंस चुके हैं, जिनके शेयर अच्छे फंडामेंटल्स के बावजूद उनकी खरीद के भाव से नीचे ही नीचे चल रहे हैं। दरअसल, बाजार अपना मूल चरित्र खो चुका है और उस पर सट्टेबाजी और जोड़तोड़ हावी हो गई है। हालत यह है कि आज बोगसऔरऔर भी