कर्ज-फांस तक ऑपरेटरों पर बेअसर

तीन साल पुराने लेहमान ब्रदर्स के प्रेत ने हमारे निवेशकों व ट्रेडरों के मन को अभी तक अवांछित नकारात्मकता से भर रखा है। अमेरिका के ऋण संकट को यहां इतनी संजीदगी से देखा जा रहा था जैसे भारत व एशिया के निवेशकों ने ही अमेरिका को सारा उधार दे रखा हो और कोई भी संभावित डिफॉल्ट उनका धन स्वाहा कर देगा। यह निराशावाद की इंतिहा है और मेरी राय में अगर कोई निवेशक जोखिम नहीं उठा सकता तो उसे इक्विटी शेयरों में धन लगाने का कोई हक नहीं बनता।

यहां जो ज्यादा जोखिम लेता है, उसे अनिश्चितता के बादल छंटने पर उतना ही ज्यादा फायदा मिलता है। दरअसल, मैं मार्क मोबियस की इस राय से पूरा इत्तेफाक रखता हूं कि अमेरिकी सरकार द्वारा भुगतान में चूक होने से तात्कालिक झटका जरूर लगेगा, लेकिन इसका अमेरिकी शेयर बाजार पर व्यापक स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

निवेशकों को यह भी समझना होगा कि जब ग्रीस जैसा देश, जो मुंबई के घाटकोपर इलाके जितना भी बड़ा नहीं है, ऋण संकट से उबर सकता है तो यह वाकई बे-सिरपैर की सोच है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, अमेरिका खुद को कर्ज के संकट से नहीं निकाल पाएगी। फिर भी, इससे कोई इनकार नहीं कि बाजार आपको यह सब सिखाता है ताकि आप जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दिखाएं। असल में, शुक्रवार शाम बाजार में इस कदर दहशत छाई थी कि नए हफ्ते का पहला दिन इस बार काला सोमवार बन सकता है। लेकिन जैसा मेरा अनुमान था, ऐसा कुछ नहीं हुआ और निफ्टी 0.63 फीसदी बढ़कर 5500 के निर्णायक स्तर से ऊपर पहुंच गया।

असल में 1962 के बाद से अमेरिका 72 बार अपनी ऋण सीमा बढ़ा चुका है। इस साल जनवरी 2011 में खुद-ब-खुद ऋण सीमा बढ़ाने वाला कानून हटा लिया गया। यह वाकई बड़ा अफसोसजनक बात है कि तब अमेरिका के अर्थशास्त्रियों को यह समझ में नहीं आया कि कानून को हटाने के छह महीने बाद जुलाई 2011 में ही उनका देश कर्ज की फांस में पड़ जाएगा। हालांकि कानून हटाने के पीछे खास मंतव्य रहा होगा। मंतव्य यह हो सकता है कि सीमा को पूरी तरह हटा दिया जाए ताकि सरकारी घाटे की बेरोकटोक फाइनेंसिंग की जा सके।

कल अमेरिका के दोनों ही राजनीतिक दल ऋण-सीमा को बढ़ाने और खर्चों को घटाने पर सहमत हो गए। यह इस बात संकेत है कि अगले छह महीनों में वहां एक और बड़ी क्वांटिटेटिव ईजिंग (क्यूई-3) होनेवाली है। इससे सिस्टम में मुद्रा का प्रवाह बेहिसाब बढ़ जाएगा। इसका बेहद प्रतिकूल असर तीन-चार साल बाद सामने आ सकता है। लेकिन मसला तो आज का है, चार साल का बाद का नहीं। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव अगले साल होने हैं। इसलिए मेरा मानना है कि अमेरिका के ऋण संकट पर बाजारों की प्रतिक्रिया कुछ ज्यादा ही अतिरंजित थी।

भारत के तेजड़िए अगर पिछले सेटलमेंट में चहकने की खास वजह के बिना ही निफ्टी को 5700 पर ले गए तो इस बार भी वे बिना किसी वजह के इसे 6300 तक ले जा सकते हैं। हालांकि कंपनियों के लाभार्जन को छोड़ दें तो ऐसा करने की सारी घरेलू वजहें मौजूद हैं। ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला भी अब समाप्ति पर है। लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी घटनाओं पर निवेशक अर्थशास्त्रियों से भी ज्यादा बहस करने लग जाते हैं जिससे बाजार के उस्तादों को इसकी लय तोड़ने का मौका मिल जाता है और वे फिर इसे अपने हिसाब से नचाने लगते हैं।

इन ऑपरेटरों को दुनिया-जहान से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। अमेरिका में ऋण संकट हो या न हो, वे चाहें तो बाजार को कभी भी उठा-गिरा सकते हैं। उनके ऊपर भगवान के साथ-साथ एक्सचेंजों, खासकर एनएसई की भी मेहरबानी है क्योंकि वह डेरिवेटिव सौदों में फिजिकल सेटलमेट लागू करने के कतई पक्ष में नहीं हैं। कल बाजार के लिए सुस्ती का एक और दिन होगा। हालांकि रुझान बढ़ने का है। फिर तो बुधवार बस एक दिन दूर रह जाएगा!

कोई आपका शिद्दत से प्यार करता है तो आपको ताकत मिलती है। वहीं, जब आप किसी को शिद्दत से प्यार करते हैं तो आपका साहस बढ़ जाता है।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ है। लेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होंगे। यह मूलत: सीएनआई रिसर्च का फीस-वाला कॉलम है, जिसे हम यहां मुफ्त में पेश कर रहे हैं)

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