अमेरिकी ऋण संकट टला, लेकिन खतरा बरकरार

अमेरिका का ऋण संकट फिलहाल टल गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों – डेमोक्रेट्स व रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं के बीच सरकार की मौजूदा 14.3 लाख करोड़ डॉलर की ऋण सीमा को बढ़ाने पर सहमति हो गई है जिससे वह जरूरी भुगतान कर सकती है। यह भी तय हुआ है कि अमेरिकी सरकार अगले दस सालों में अपने खर्च में 2.4 लाख करोड़ डॉलर की कटौती करेगी। अब इस सहमति को मंगलवार, 2 अगस्त को अमेरिकी संसद से पारित कराना होगा।

इस तरह 2 अगस्त की अंतिम तिथि से ठीक पहले अमेरिका अपने ऋण संकट को टालने में कामयाब तो रहा है, लेकिन देश की रेटिंग को घटाए जाने का खतरा अब भी बरकरार है। इस समय अमेरिका की रेटिंग सबसे ज्यादा एएए है। लेकिन इसे घटाकर एए किया जा सकता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, सिंगापुर में कार्यरत बैंक ऑफ अमेरिका-मेरिल लिंच के एक अर्थशास्त्री चुआ हक बिन का कहना है कि, “ऋण सीमा बढ़ाने से डिफॉल्ट की आशंका को खत्म कर दिया है। लेकिन स्वीकृत योजना अब भी भविष्य के बजट घाटे को विश्वसनीय रूप से सुलझाने और डाउनग्रेड को रोकने में सक्षम नहीं है।” रेटिंग एजेंसियों की तरफ में अमेरिका में हुई ताजा सहमति पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

राजनीतिक सहमति होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस प्रेस को देर रात बताया कि सरकारी कटौती के परिणामस्वरूप सालाना घरेलू खर्च पिछले कई सालों में सबसे कम होगा। फिर भी यह ऐसा स्तर होगा जहां हम शिक्षा और अनुसंधान जैसे रोजगार सृजन वाले कार्यों में निवेश कर सकेंगे। साथ ही हेल्थकेयर पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

अगर ऐन-वक्त पर यह सहमति नहीं बनती और अमेरिका कर्ज भुगतान में चूक कर देता तो अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया पर इसका घातक असर होता। असल में चीन, जापान व अन्य एशिया देशों ने अमेरिका को करीब 3 लाख करोड़ डॉलर या 3000 अरब डॉलर का कर्ज उसके बांडों में निवेश के रूप दे रखा है। इनमें चीन सबसे ऊपर है और उसके बाद जापान का नंबर है। मई 2011 तक अमेरिका के ट्रेजरी बांडों में चीन ने 1159.8 अरब डॉलर और जापान ने 912.4 अरब डॉलर लगा रखे हैं। भारत का निवेश महज 41 अरब डॉलर है।

चीन के एक सरकारी समाचार पत्र ने पहले कहा था कि अमेरिका जिस तरीके से अपने ऋण संकट को हल कर रहा है, वह गैर-जिम्मेदाराना और अनैतिक है। अब जापान ने कहा है कि अमेरिका ने क्रेडिट डाउनग्रेड के बचने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। उसने कहा कि इसके लिए अमेरिका को अतिरिक्त कदम उठाने पड़ेंगे। जापान के उप-वित्त मंत्री फुमिहिको इगाराशि का कहना है कि अगर आप विदेशी मुद्रा बाजार को देखें तो जापानी येन में तेज गिरावट नहीं आ रही है। इसकी एक वजह यह है कि अमेरिका को डाउनग्रेड किए जाने का खतरा अब भी बरकरार है। इसलिए अमेरिकी सरकार को अपने सार्वजनिक खर्चों में स्थायित्व लाना पड़ेगा।

उधर दुनिया के बाजारों को रेटिंग एजेंसियों के रुख का इंतजार है। वैसे, स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने करीब महीने भर पहले ही साफ संकेत दे दिया था कि राजनीतिक सहमति बनने पर भी वह अमेरिका की संप्रभु रेटिंग एएए से घटाकर एए कर सकती है। उसका कहना था कि सरकार को ऋण अदायगी की पूरी व्यवस्था को अगले कुछ सालों के लिए चुस्त-दुरुस्त करना होगा।

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