सच कहें तो धंधा और कुछ नहीं, बस दूसरों से जुड़ने की कोशिश है। उस समान चीज को पकड़ने का उपक्रम है जो सबमें है, सबकी जरूरत है। कंपनियां सर्वे से इसका पता लगाती हैं और ज्ञानी अपनी अंतर्दृष्टि से।और भीऔर भी

यहीं थोड़ी दूर कहीं हमारा बचपन खेल रहा होगा। पड़ोस में कहीं हमारा बुढ़ापा खांस रहा होगा। देखना चाहें तो अपना अतीत व भविष्य अपने ही इर्दगिर्द देख सकते हैं। हम क्या थे, क्या बनेंगे, समझ सकते हैं।और भीऔर भी

मरीचिकाएं रेगिस्तान में ही नहीं, जीवन में भी होती हैं। पत्ते आम के होते हैं, लेकिन पेड़ बबूल का होता है। लोग जैसे दिखते हैं, होते नहीं। दूर से अंदर की परतें नहीं दिखतीं, जबकि यही तो असली हैं, बाहर बस खोल है।और भीऔर भी

हम सभी अपने वर्तमान से दुखी, अतीत पर मुग्ध और भविष्य को लेकर डरे हुए क्यों रहते हैं? क्या हम आज को लेकर मगन, बीत चुके पल के प्रति निर्मम और आनेवाले कल को लेकर बिंदास नहीं हो सकते?और भीऔर भी

हम सफल हुए बिना ही सफलता की हसीन वादियों में खो जाते हैं। महान बने बिना ही महानता की आभा में जीने लगते हैं। यह एकदम स्वाभाविक है। लेकिन इस तरह मुंगेरीलाल बनना हमारे लिए अच्छा नहीं है।और भीऔर भी

सत्य की जीत अपने आप नहीं होती। इसके लिए थोड़े झूठ, थोड़े छल का सहारा लेना पड़ता है। इसके लिए ‘नरो व कुंजरो व’ पर शंख बजाना, रथ से नीचे उतरे कर्ण से छल करना और विभीषण से भेद लेना जरूरी होता है।और भीऔर भी

हर कोई अपनी-अपनी दुनिया में मस्त है। हम भी हैं। इसमें क्या बुराई! लेकिन यह तो पता होना चाहिए कि दुनिया की किन चीजों ने हमारी दुनिया को अपनी जद में ले रखा है। टिटिहरी या शुतुरमुर्ग जैसा भ्रम क्यों?और भीऔर भी

हवाई जहाज से झुग्गियां भी ज्यामितीय आकार में सजी हुई दिखती हैं। पास आने पर असलियत खुलती है। दूर से दिखता है बस तमाशा। बदलना हो तो पास जाना पड़ता है, माइक्रोस्कोप तक से देखना पड़ता है।और भीऔर भी

मन की करें तो अच्छा लगता है। लेकिन क्या अच्छा है क्या बुरा, यह मन नहीं जानता। मन तो ड्रग एडिक्ट का भी और भोजनभट्ट का भी। मन को संस्कारित करना पड़ता है। इसे छुट्टा छोड़ देना घातक है।और भीऔर भी

भावना बोली मैं सही। तर्क बोला मैं सही। भावना तर्क को उलाहना देती है कि तेरे रूखे-सूखे ज्ञान मार्ग से बाहर की दुनिया सधती है, अंदर की कलसती है। तर्क कहता है – तेरा भक्ति मार्ग सरासर मूर्खता है। तकरार जारी है।और भीऔर भी