अंश और समग्र
थोड़े-थो़ड़े अंश में हम सब कुछ हैं। संत भी, अपराधी भी। बालक भी, वृद्ध भी। सांप भी, बिच्छू भी। बेध्यान न रहें तो अपना अंश बाहर दिखेगा और दूसरों का अंश अपने अंदर। ऐसा देखने से हर उलझन सुलझने लगती है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
थोड़े-थो़ड़े अंश में हम सब कुछ हैं। संत भी, अपराधी भी। बालक भी, वृद्ध भी। सांप भी, बिच्छू भी। बेध्यान न रहें तो अपना अंश बाहर दिखेगा और दूसरों का अंश अपने अंदर। ऐसा देखने से हर उलझन सुलझने लगती है।और भीऔर भी
पैसा बांटने से घटता है। लेकिन ज्ञान को जितना बांटों, बढ़ता जाता है। ज्ञान तो शहद की तरह है। फूल से निकलता है तो बढ़ता ही है। मधुमक्खियां उसे ले जाकर पूरा छत्ता ही बना लेती हैं।और भीऔर भी
पुराने के बीच हमेशा नया बनता रहता है। पुराना हमें बांधे रखता है तो नया हमें खींचता है। इनके बीच हम तलवार की धार पर चलते हैं। लेकिन नया-नया रटने के बावजूद ज़रा-सा चूके तो पुराने के खेमे में जा गिरते हैं।और भीऔर भी
अनंत चुम्बकीय क्षेत्रों से घिरे हैं हम। अणु-परमाणु तक का अपना हलका है। ऐसे में खुद भी एक गुरुत्व व चुम्बकीय क्षेत्र के मालिक होने के नाते हम जितना चल सकते हैं, वह हमारी आजादी है। बाकी सब विधि का विधान है।और भीऔर भी
जिस तरह दही को मथने से मक्खन निकलता है, उसी तरह मंत्रों का निरंतर जाप हमारे अंदर छिपी शक्तियों को बाहर निकालता है। मंत्र राम भी हो सकता है और मरा भी। यह वाक्य भी हो सकता है और विचार भी।और भीऔर भी
वैसे तो हर मां को अपना कुरूप बच्चा भी रूपवान लगता है। लेकिन हम भी तो अपने पर फिदा रहते हैं। आईना हमें अपनी ही नजर से खुद को देखने का मौका देता है। सोचिए, आईना नहीं होता तो क्या होता?और भीऔर भी
भगवान एक ट्रोज़ान हॉर्स है जो प्रकृति से हमारे मानस को मिले हर सॉफ्टवेयर की स्पीड स्लो कर देता है, मन की तमाम प्रोग्राम फाइलों को करप्ट कर देता है। पूरी क्षमता पाने के लिए इस वायरस से मुक्ति जरूरी है।और भीऔर भी
जब तक जगे रहे, ज़िंदा रहे। सो गए तो मर गए। फिर जगे तो नया जीवन। ज़िदगी को यूं जागने-सोने के चक्र में बांटना अच्छा लगता है। लेकिन हो कहां पाता है क्योंकि कोशिकाओं तक की अपनी यादें होती हैं।और भीऔर भी
महान अतीत हमारे पीछे है। संभावनामय भविष्य हमारे आगे है। इन दोनों के बीच की अटूट कड़ी हैं हम। अतीत के वारिस और भविष्य के ट्रस्टी। जरा सोचिए, हमारी पीढ़ी को कितनी बड़ी जिम्मेदारी निभानी है।और भीऔर भी
जब तक जीवित हैं, शरीर कभी ऑफ नहीं लेता, दिल दिमाग कभी ऑफ नहीं लेता। लेकिन हम हमेशा ऑफ के चक्कर में पड़े रहते हैं। मन काम से भागता है। यह काम जीवन की सहज धारा क्यों नहीं बन सकता?और भीऔर भी
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