हर काम को अपना ही समझ कर करना चाहिए। पराया समझ कर करते हैं तो बोझ लगता है, किसी पर किया गया एहसान लगता है। वैसे भी सच तो यही है कि हम अपने अलावा और किसी पर एहसान नहीं करते।और भीऔर भी

चीजें छोटी-छोटी करके ही बड़ी बनती हैं, तिल-तिल कर बढ़ती हैं। गर्भ में भ्रूण धीरे-धीरे आकार लेता है। औरों को कई महीने बाद पेट का आकार देखकर पता चलता है, लेकिन मां तो हर पल उसे पलता-बढ़ता देखती है।और भीऔर भी

प्रकृति ने हर जीव को बचाव का कोई न कोई साधन अलग से दे रखा है। शेर को दांत व पंजे, बैल को सींग व खुर तो कीड़े-मकोड़ों को रंग बदलने की क्षमता। इसी तरह इंसान को उसने सोचने की ताकत दे रखी है।और भीऔर भी

डरपोक और कायर होना जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। ये फितरत हमसे बहुत सारी खुशियां छीन लेती है। बाप-दादा से मिली दौलत तक सीमित रह जाते हैं हम। शास्त्रों तक में कहा गया है वीर भोग्या वसुंधरा।और भीऔर भी

जिंदगी में हताश होकर गिरना बहुत आसान है। लेकिन यह निर्जीव पत्थर का स्वभाव है, जिंदा इंसान का नहीं। हम किसी लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट के पात्र भी नहीं हैं। निमित्त या कठपुतली नहीं है हम। सजीव हैं हम।और भीऔर भी

हम भावनाओं के भूखे हैं। सिर्फ लेना चाहते हैं, देना नहीं। ज्ञान में ठीक इससे उलट हैं। सिर्फ देना चाहते हैं लेना नहीं। काश! ज्ञान के मामले में हम शाश्वत भिक्षु बन जाते और भावनाओं के मामले में दानवीर कर्ण। आमीन!और भीऔर भी

सेल्समैन होने में कोई बुराई नहीं। हम सभी सेल्समैन ही तो हैं। बचपन से लेकर बड़े होने तक अपनी बातें, अपनी जिद ही तो बेचते रहते हैं। हां, बस इतना है कि हमको वही बेचना चाहिए जिस पर खुद हमें पूरा यकीन हो।और भीऔर भी

जैसे कोई खुद को खोजने की निशानियां जान-बूझकर छोड़े जा रहा हो, जैसे कोई मां अभी-अभी चलना सीखे बच्चे के साथ लुकाछिपी खेलती है, उसी तरह हर सवाल अपने समाधान के सूत्र हमारे आसपास ही रख छोड़ता है।और भीऔर भी

अपने को जानने-समझने के लिए दूसरे को जानना समझना जरूरी है। दूसरे के प्रति आप कितने संवेदनशील हैं, इसी से आपकी संवेदनशीलता का पता चलता है। वरना, अपने प्रति तो हर कोई संवेदनशील होता है।और भीऔर भी

दिमाग भी क्या स्वामिभक्त और जिद्दी किस्म का जीव है! जिस ढर्रे पर चला दो, चलता ही रहता है। जिस काम में लगा दो, बिना पूरा किए मानता ही नहीं। आप सो जाते हो, लेकिन इस बेचैन आत्मा को चैन नहीं पड़ता।और भीऔर भी