सही प्लेसिंग
एक जगह फिसड्डी बना इंसान दूसरी जगह जाते ही चमकने लगता है। सब सही प्लेसिंग का कमाल है। संयोग कभी-कभी आपकी सही प्लेसिंग कर देता है, पर अक्सर हमें अपनी जगह खुद बनानी पड़ती है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
एक जगह फिसड्डी बना इंसान दूसरी जगह जाते ही चमकने लगता है। सब सही प्लेसिंग का कमाल है। संयोग कभी-कभी आपकी सही प्लेसिंग कर देता है, पर अक्सर हमें अपनी जगह खुद बनानी पड़ती है।और भीऔर भी
किसी को छोटा दिखाने से क्या फायदा! उसे छोटा दिखाने से हमारी ताकत ही घटती है, कद नहीं बढ़ता। किसी भी लकीर को छोटा दिखाने का सबसे अच्छा तरीका है उसके सामने बड़ी लकीर खींच देना।और भीऔर भी
नैतिकता आसमान से नहीं टपकती। मूल्य हवा से नहीं आते। सामाजिक व्यवस्था को चलाने के लिए कानून बनाए जाते हैं। यही कानून जब व्यापक स्वीकार्यता हासिल कर लेते हैं तो नैतिक मू्ल्य बन जाते हैं।और भीऔर भी
लय-ताल का साथ पाकर श्रम की सारी कठोरता हल्की पड़ जाती है। श्रम का रूखापन मिट जाता है, भले ही वह श्रम शारीरिक हो या मानसिक। इसलिए संगीत व श्रम की जोड़ी बड़े काम की है और जरूरी भी।और भीऔर भी
पुराने के भीतर नया पनपता रहता है। प्रकृति में पुराना हमेशा नए को जगह दे देता है। लेकिन समाज में पुराना अपनी जगह सहजता से छोड़ने को तैयार नहीं होता। इसलिए संघर्ष होता है, खून-खच्चर होता है।और भीऔर भी
चलने के लिए पैर चाहिए और पैर हमेशा जोड़े में होते हैं। कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा कितने भी। एक पैर के जीव तो पेड़ बन जाते हैं। वो बढ़ते हैं और खिलते भी। लेकिन हमेशा औरों के रहमोकरम पर।और भीऔर भी
पहले सड़क ही बनती थी। अब स्काई-ओवर भी बनते हैं। पहले जमीन से मिलती थी सुरक्षा। अब अंतर-संबंधों का मकड़जाल सुरक्षा देता है। पहले सब कुछ मूर्त था। अब बहुत कुछ अमूर्त है। वाकई बदल गया है जमाना।और भीऔर भी
जब भी हम नया कुछ रचते हैं, रुके हुए सोते बहने लगते हैं, अंदर से ऐसी शक्तियां निकल आती हैं जिनका हमें आभास तक नहीं होता। इसलिए काम शुरू कर देना चाहिए, काबिलियत अपने-आप आ जाएगी।और भीऔर भी
उसे प्रकृति कहिए या भगवान, उसकी बनाई हर चीज अपूर्ण होती है, आदर्श नहीं। आदर्श तो इंसान ने अपनी प्रेरणा के लिए बनाए हैं। इसलिए इंसान की किसी भी रचना को यथार्थ का पैमाना मानना सही नहीं।और भीऔर भी
हम में से हर किसी में कोई न कोई जानवर छिपा बैठा है। वह सांप, गोजर, बिच्छू से लेकर ऊंट, शेर और हाथी भी हो सकता है। हम उसे पहचान लें, आत्मदर्शन कर लें तो इंसान बनना ज्यादा आसान हो जाता है।और भीऔर भी
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