सच-झूठ के बीच कभी रहा होगा काले-सफेद या अंधेरे उजाले जैसा फासला। लेकिन अब यह फासला इतना कम हो गया है कि कच्ची निगाहें इसे पकड़ नहीं सकतीं। जौहरी की परख और नीर-क्षीर विवेक पाना जरूरी है।और भीऔर भी

हमारे शरीर में एक स्वतंत्र प्रणाली बराबर काम करती है। चेतना कोई फैसला करे, दिमाग इससे पहले ही फैसला कर चुका होता है। लेकिन इंसान होने का लाभ यह है कि चेतना दिमाग के फैसले को पलट भी सकती है।और भीऔर भी

कायर से गठजोड़ कभी न करो क्योंकि वह सिर्फ अपनी चमड़ी देखता है। किसी की परवाह नहीं करता। उसके हाथ में सत्ता हो तो उसे तानाशाह बनते देर नहीं लगती। कमाल तो यह है कि लोग उसे बहादुर समझते हैं।और भीऔर भी

आत्मविश्वास वह बल है जो हमारी शक्तियों को केंद्रित करता है। हम या  हमारी कौम अपने अतीत को नकार कर यह बल हासिल नहीं कर सकते। आज जरूरत टूटी हुई कड़ियों को जोड़कर इस बल को जगाने की है।और भीऔर भी

जो कल सही था, आज भी सही हो, जरूरी नहीं। विचार या व्यक्ति का सही होना तय करती है प्रासंगिकता। हर वस्तु व इंसान की तरह विचार का भी जीवनकाल होता है। हर विचार को नया जन्म लेना ही पड़ता है।और भीऔर भी

खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे। तो क्या बीच में जो था, वो सब निरर्थक था? नहीं। बीच में थी रचनात्मकता जिसने हमें रंग दिया, अर्थ दिया। जीवन कितना जिया? जितना हम रचनात्मक रहे, सृजन किया। बस…और भीऔर भी

कोई भी घर-परिवार, देश या समाज अपना रह गया है या नहीं, इसकी एक ही कसौटी है कि वहां आप भय-मुक्त और निश्चिंत रहते हैं कि नहीं। जो आक्रांत करता है, वह अपना कैसे हो सकता है? वह तो बेगाना ही हुआ न!और भीऔर भी

उम्र बढ़ती है, मृत्यु करीब आती है। लेकिन ज़िंदगी नहीं घटती क्योंकि समझदारी से जिया गया एक साल मूर्खता में जिए गए बीसियों साल के बराबर होता है जैसे रुई का बड़ा ढेर भी कुछ किलो लोहे से नप जाता है।और भीऔर भी

यूं तो किसी भी आदत तो जड़ से मिटा देना ही अच्छा। लेकिन न मिटे तो उसे मोड़ देना चाहिए। जैसे, हम आदतन भिखारी को पैसा देते हैं। ये एक-दो रुपए हमें नई किताब खरीदने के लिए ज्ञान-पात्र में डाल देने चाहिए।और भीऔर भी

सोने पर चेतना गायब और जगने पर वापस! बीच में जाती कहां है? कहीं नहीं। मानव मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉन हैं जिनके बीच खरबों तार है। वे बराबर बतकही करते हैं। हमारे सोने पर चुपके से बतियाते हैं।और भीऔर भी