सरासर नाइंसाफी
कभी-कभी किसी के साथ रहना सज़ा से कम नहीं होता। सज़ा आजीवन कारावास की हो तो और सांसत! गुनाह किया हो तो सज़ा कुबूल है। लेकिन बगैर गुनाह के सज़ा मिलना तो सरासर नाइंसाफी है भाई।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
कभी-कभी किसी के साथ रहना सज़ा से कम नहीं होता। सज़ा आजीवन कारावास की हो तो और सांसत! गुनाह किया हो तो सज़ा कुबूल है। लेकिन बगैर गुनाह के सज़ा मिलना तो सरासर नाइंसाफी है भाई।और भीऔर भी
किसी समस्या का विकराल या मामूली लगना इससे तय होता है कि हम सो रहे हैं या जग रहे हैं। सोते वक्त जरा-सी समस्या भी भयावह लगती है। इसलिए पहले नींद से निकलें, फिर समस्या से लड़ाएं पंजा।और भीऔर भी
प्रकृति ने हर इंसान को मौलिक बनाया है। एक ही मां-बाप की संतानों में जीन्स का भिन्न समुच्चय। फिर भी अनुकृतियों से भरा समाज! दोष किसका? थोड़ा हमारा तो बहुत सारा जीने की शर्तों का।और भीऔर भी
हर जीव सृजन के लिए एकाकीपन और बचाव के लिए झुंड का इस्तेमाल करता है। इंसान भी इससे अलग नहीं है। बस, समाज बन जाने से फर्क यह पड़ा है कि अच्छी टीम इंसान के सृजन को निखार देती है।और भीऔर भी
चीजें पहले अच्छी लगती हैं। फिर अपनी लगती हैं। फिर, अपनी बनती हैं। पर, अच्छा लगने और अपना बनने तक का सफर सीधा-सरल नहीं होता। यह बात विचारों से लेकर लोगों तक पर लागू होती है।और भीऔर भी
इंसान की सृजनात्मकता निठल्ले चिंतन की उपज नहीं होती। संघर्ष-विहीन जीवन से सृजन नहीं, उबासियां निकलती हैं। कठोर वास्तविकता की रगड़-धगड़ से ही सृजन की चिनगारी फूटती है।और भीऔर भी
हर पल महाभारत छिड़ी है। मोह में फंसकर अर्जुन अकर्मण्य हो जाता है। अंदर का कृष्ण ज्ञान न कराए तो हम हथियार डालकर बैठ जाते हैं। लेकिन लड़े बिना न यह धरती मिलती है और न ही वीरगति।और भीऔर भी
अगर हर दिन आपके भीतर कोई नया विचार नहीं कौंधता, गुत्थियों से भरे इस संसार में किसी गुत्थी को सुलझाने का हल्का-सा सिरा भी नहीं मिलता तो समझ लीजिए कि आप जीते जी मर चुके हैं।और भीऔर भी
न सीखने की कोई उम्र होती है और न ही गलतियों को दुरुस्त करने के लिए अगले जन्म की जरूरत होती है। जो कहते हैं कि अगले जन्म ये गलती नहीं करेंगे, वे बस अपनी चमड़ी बचा रहे होते हैं।और भीऔर भी
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