जन्मना-पनपना
पुराने का अपना चुंबकीय क्षेत्र व गुरुत्व है। नया पुराने के ही भीतर जन्मता है, पनपता नहीं। इसलिए असंतोष को दिल में रखकर पुराने में ही कोई कोना पकड़ लेनेवाले लोग नए का सृजन नहीं कर पाते।और भीऔर भी
गुरु के बिना
जो लोग आत्म-मुग्ध होते हैं, भगवान की जरूरत उन्हें पड़ती हैं और जो अपने से मुक्त हैं, उन्हें गुरु की। भगवान तो अपनी छाया है। उससे क्या डरना और क्या पाना? हां, गुरु जरूर हमें बहुत कुछ देता है।और भीऔर भी
समुद्र की बूंद
यहां से वहां तक समुद्र। लहरों के बीच में हम। गले तक पानी। धरती नजर ही नहीं आती। कितना घबराते हैं हम! लेकिन समुद्र की बूंदें तो लहरों के साथ कुलांचे मारती हैं। हम भी तो बूंद ही हैं जन समुद्र की।और भीऔर भी
बेकाम आत्मा
बस एक छाप, अनुभूति या आत्मा भर बची रह गई। क्या करूं उसका? महसूस कर सकता हूं पर देख नहीं सकता, छू नहीं सकता। शब्दों के शरीर में ढाल नहीं सका तो सब कुछ रहते हुए भी कुछ नहीं रहा।और भीऔर भी
शर्त कुर्सी की
कुर्सी पकड़ते ही कुर्सी आपको जकड़ लेती है। उससे निकली लौह-लताएं आपको लपेट लेती हैं। आप इंसान से सत्ता के पुर्जे बन जाते हो और आपकी चमडी सीमेंट जैसी सख्त व संवेदनहीन हो जाती है।और भीऔर भी
दायरे की जरूरत
दुनिया में ऐसा कुछ नहीं जो किसी न किसी को पता न हो या उसे जानने की कोशिश न चल रही हो। सबको सब पता रहे, जरूरी नहीं। लेकिन ज़िंदगी का दायरा जितना बड़ा हो, उतना तो जानना जरूरी है।और भीऔर भी
यीन-बीन-तीन
तीन तरह के लोग होते हैं। एक, जिनके लिए कोई समस्या नहीं होती। दो, जो मानते हैं कि समस्या तो है, पर समाधान नहीं। तीन, जो मानते हैं कि समस्या है और इसे हल भी किया जा सकता है।और भीऔर भी
समस्याओं का स्वागत
समस्याओं का होना कोई बुरी बात नहीं, अगर हम उनसे जूझने को तैयार हों। देखें कि कौन-सी समस्या व्यक्तिगत है और कौन-सी व्यवस्था-जन्य क्योंकि इनसे निपटने के तरीके भिन्न होते हैं।और भीऔर भी
