सच का संघर्ष
गुरु, किताब या ज्ञान के अन्य स्रोतों की भूमिका इतनी भर है कि वे हमारे मन-मस्तिष्क पर पड़े माया के परदे को हटा देते हैं। इसके बाद वास्तविक सच तक पहुंचने का संघर्ष हमें अकेले अपने दम पर करना पड़ता है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
गुरु, किताब या ज्ञान के अन्य स्रोतों की भूमिका इतनी भर है कि वे हमारे मन-मस्तिष्क पर पड़े माया के परदे को हटा देते हैं। इसके बाद वास्तविक सच तक पहुंचने का संघर्ष हमें अकेले अपने दम पर करना पड़ता है।और भीऔर भी
देखती हैं आंखें, दिखाते हैं हम। माइक्रोस्कोप से देखा तो असंख्य बैक्टीरिया नजर आ जाते हैं। टेलिस्कोप से देखा तो दृष्टि से ओझल सितारा दिख जाता है। असली सच नंगी आंखों से देखे गए सच से बहुत बड़ा होता है।और भीऔर भी
ज्ञान और प्रकाश के माहौल में ही लक्ष्मी बढ़ती हैं, फलती फूलती हैं। अज्ञान और अंधकार के बीच वे नष्ट हो जाती हैं। दीपावली पर जलाए जानेवाले दीप प्रकाश और ज्ञान के ही प्रतीक हैं। राम की वापसी तो बस कहानी है।और भीऔर भी
न आदि है, न अंत है। वह अनंत है। इस अनंत समय को कैसे नाथा जाए? लेकिन हमने इसे नाथ लिया। समय भले ही अनवरत बहता रहे, लेकिन दिन, महीने, साल में हम उसका हिसाब रखते हैं। नई यात्रा शुरू करते हैं।और भीऔर भी
यूं तो नया आने के साथ ही पुराना मिटना शुरू हो जाता है। लेकिन पुराने कंकास को हटाने का काम सायास करना पड़ता है। दीपावली से ठीक पहले की रात मन व जीवन के कंकास या दलिद्दर को हटाने का मौका होती है।और भीऔर भी
कोई आपकी सूरत या सीरत में अपना खुदा देखता है तो देखने दीजिए। उसे खुशफहमी है या गलतफहमी, इससे आपको क्या! हां, अगर आप उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने की कोशिश करें तो इसमें आपका ही भला है।और भीऔर भी
जिस प्रकार ज्ञान विचारों और संस्कारों के रूप में आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है, उसी प्रकार अज्ञान भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की विरासत बन जाता है। इसलिए अज्ञान को मिटाते रहना हमारा दायित्व है।और भीऔर भी
इसे अहम कहें या आत्ममुग्धता, हम अपने में खोए और आक्रांत रहते हैं। खूंटे से बंधी गाय की तरह हमारा वृत्त बंध गया है। आम से लेकर खास तक, ज्ञानी और विद्वान तक अंदर के चुम्बक से पार नहीं पा पाते।और भीऔर भी
चलने पर चौराहे नहीं, अठराहे भी मिल सकते हैं। लेकिन चलने से ही राहें खुलती हैं। चलिए तो समुद्र भी दोफाड़ होकर आपकी राह संवार देता है। तो, काहे रुके हो भाई! चलो तो सही। मंजिल आपकी बाट जोह रही है।और भीऔर भी
जो लोग रिश्तों और दूसरे लोगों की कद्र नहीं करते, उनका हश्र नितांत अकेलेपन और घुटन में होता है। हो सकता है कि वे बहुत ज्यादा पैसे कमा लें। लेकिन पैसे से प्यार तो छोड़िए, खुशी का धेला तक नहीं खरीदा जा सकता।और भीऔर भी
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