नौकरी और बरक्कत
सिर्फ अपने या अपनों के लिए कमाने से नौकरी होती है, बरक्कत नहीं होती। बरक्कत तब होती है, दौलत तब बरसती है, जब आप किसी सामाजिक संगठन, संस्था या कंपनी के लिए कमाते हो।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
सिर्फ अपने या अपनों के लिए कमाने से नौकरी होती है, बरक्कत नहीं होती। बरक्कत तब होती है, दौलत तब बरसती है, जब आप किसी सामाजिक संगठन, संस्था या कंपनी के लिए कमाते हो।और भीऔर भी
दिमाग की धमनभठ्ठी को धधकने दें। विचारों की आंधी को धौंकनी बना दें और आग्रहों-पूर्वाग्रहों के खर-पतवार को ईंधन। रक्ताभ ज्वाला में फिर निखरेगा कुंदन, शांत व सम्यक ज्ञान का कुंदन।और भीऔर भी
विचार को व्यक्ति से बांध कर देखना सही नहीं। ये विचार न तेरे हैं, न मेरे हैं। हम तो बस निमित्त हैं। विचार हमारे अंदर से निकलने के बाद स्वतंत्र हो जाते हैं। वे हमारी बपौती नहीं रह जाते।और भीऔर भी
दूसरों को अपने जैसा समझना पहले भी गलत था, आज भी गलत है। आप सच्चे हो, अच्छा है। लेकिन सामनेवाला इंसान नेवला है कि भेड़िया, गाय है कि गोजर – यह तो आपको देखना ही पड़ता है।और भीऔर भी
हाथ फैलाते जाइए, लोगों से जुड़ते जाइए, नेटवर्क बनाते जाइए। यह विकास का क्षैतिज तरीका है। लेकिन मन से जुड़ना और मन से बढ़ना है तो इंसान के अपने अंदर का ऊर्ध्व विकास जरूरी है।और भीऔर भी
हम लूली-लंगड़ी सूचनाओं के आधार पर विचार फेंकने के आदी हो गए हैं। लेकिन यूं ‘ज्ञान’ बघारना विशुद्ध आत्ममुग्धता है। अरे! समाचार व सूचनाओं को तो खुलकर आने दो, विचार अपने-आप बन जाएंगे।और भीऔर भी
जो लोग ज़िंदगी को बोझ समझते हैं, वे कुछ न करें तो चलता है। लेकिन जो लोग ज़िंदगी को जमकर जीना चाहते हैं, वे अगर आकस्मिकता की तैयारी नहीं रखते तो वे बिंदास नहीं, बेवकूफ हैं।और भीऔर भी
हर धर्म दावा करता है कि उसकी मान्यताएं वैज्ञानिक हैं। लेकिन धर्म स्थिर है जबकि विज्ञान अपनी ही स्थापनाओं को तोड़ता बढ़ता जा रहा है। सोचिए, किसी दिन विज्ञान ही धर्म बन गया तो!और भीऔर भी
जब हमें यह लगने लगे कि इस दुनिया में हमारे लिए कोई नहीं है तो हमें यह सोचना शुरू कर देना चाहिए कि हम सबके लिए हैं। फिर एक दिन किसी से न जुड़ते हुए भी हम सबसे जुड़ जाते हैं।और भीऔर भी
शरीर को साधकर पहलवान बना जा सकता है और मन को साधकर वैज्ञानिक। लेकिन अनहद का उल्लास दोनों ही नहीं पा सकते। यह तो उन्हीं को मिलता है जो तन और मन दोनों को साधते हैं।और भीऔर भी
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