गलत तमन्ना
एक बात गांठ बांध लें कि इस दुनिया में सबकी जगह है। लेकिन हर जगह सबकी नहीं है। इसलिए हर कामयाब आदमी को देखकर उसके जैसा बनने की तमन्ना न अच्छी होती है और न ही व्यावहारिक।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
एक बात गांठ बांध लें कि इस दुनिया में सबकी जगह है। लेकिन हर जगह सबकी नहीं है। इसलिए हर कामयाब आदमी को देखकर उसके जैसा बनने की तमन्ना न अच्छी होती है और न ही व्यावहारिक।और भीऔर भी
वे लोग बड़े बदकिस्मत होते हैं जिनमें प्यार की उदात्त भावना नहीं होती, जो प्यार न ले पाते हैं, न प्यार दे पाते हैं। प्यार तो वो नेमत है जो प्रकृति ने किसी भी दूसरे जीव को नहीं, सिर्फ इंसानों को बख्शी है।और भीऔर भी
एक टूटा-सताया हुआ मन, जो सारे कलह-क्लेश से भागना चाहता है, वो अनुशासन व नियमों से बंधकर काठ जैसा जड़ हो जाता है। लेकिन जो मजा जंगली घोड़ों की सवारी में है, वह काठ के घोड़ों में कहां?और भीऔर भी
प्रकृति से कैसे निपटना है, यह तो हर जीव की तरह हम मां के पेट से सीखकर आते हैं। समाज से निपटने की शुरुआती सीख हमें घर-परिवार, स्कूल व परिवेश से मिलती है। फिर जंग में हम अकेले होते हैं।और भीऔर भी
किसी दिन कोई हमें बता देता है कि यह सही है और वह गलत। हम उसका ज्ञान ओढ़ लेते हैं। धीरे-धीरे हमारा आचार-विचार यंत्रवत हो जाता है। और, यंत्रवत होते ही हम इंसान के सत्व से हाथ धो बैठते हैं।और भीऔर भी
चीजें तो जैसी हैं, वैसी ही रहती हैं। नियमों से बंधी, भावनाओं से रहित। सीधी-सरल, देखने की नजर हो पारदर्शी। लेकिन हमारा अहम, हमारे पूर्वाग्रह उसे जटिल बना देते हैं। रस्सी को सांप बना देते हैं।और भीऔर भी
समाज में हमेशा ज्यादातर लोग संतुष्ट रहते हैं या संतोषम् परम सुखम् का जाप करते हैं। कुछ ही लोग होते हैं जो असंतुष्ट रहते हैं। दुनिया को जीने के लिए बेहतर जगह बनाने का काम इन्हीं का होता है।और भीऔर भी
जब आप सबका बनना चाहते हो तो अपना सारा कुछ उसके अधीन कर देना चाहिए। ध्यान रखें कि सबका बनने की चाह और अपना कुनबा अलग चलाने की कोशिश आपको कहीं का नहीं छोड़ती।और भीऔर भी
राजनीतिक आंदोलन में व्यक्ति व्यक्ति नहीं, बल्कि सामूहिक भावनाओं का प्रतीक होता है। ऐसे में व्यक्ति की खामियां निकालने वाले लोग अपनी नादानी में जनता नहीं, सत्ता के पाले में जा खड़े होते हैं।और भीऔर भी
सजग बु्द्धिजीवी मानव समाज का स्नायुतंत्र हैं। वे समाज को दिशा देनेवाली विचार-श्रृंखला को बनाते और बढ़ाते हैं। जो समाज बुद्धिजीवियों को मुक्त माहौल नहीं दे पाता, वह पथ-भ्रष्ट हो जाता है।और भीऔर भी
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