किसी दिन कोई हमें बता देता है कि यह सही है और वह गलत। हम उसका ज्ञान ओढ़ लेते हैं। धीरे-धीरे हमारा आचार-विचार यंत्रवत हो जाता है। और, यंत्रवत होते ही हम इंसान के सत्व से हाथ धो बैठते हैं।और भीऔर भी

चीजें तो जैसी हैं, वैसी ही रहती हैं। नियमों से बंधी, भावनाओं से रहित। सीधी-सरल, देखने की नजर हो पारदर्शी। लेकिन हमारा अहम, हमारे पूर्वाग्रह उसे जटिल बना देते हैं। रस्सी को सांप बना देते हैं।और भीऔर भी

समाज में हमेशा ज्यादातर लोग संतुष्ट रहते हैं या संतोषम् परम सुखम् का जाप करते हैं। कुछ ही लोग होते हैं जो असंतुष्ट रहते हैं। दुनिया को जीने के लिए बेहतर जगह बनाने का काम इन्हीं का होता है।और भीऔर भी

जब आप सबका बनना चाहते हो तो अपना सारा कुछ उसके अधीन कर देना चाहिए। ध्यान रखें कि सबका बनने की चाह और अपना कुनबा अलग चलाने की कोशिश आपको कहीं का नहीं छोड़ती।और भीऔर भी

राजनीतिक आंदोलन में व्यक्ति व्यक्ति नहीं, बल्कि सामूहिक भावनाओं का प्रतीक होता है। ऐसे में व्यक्ति की खामियां निकालने वाले लोग अपनी नादानी में जनता नहीं, सत्ता के पाले में जा खड़े होते हैं।और भीऔर भी

सजग बु्द्धिजीवी मानव समाज का स्नायुतंत्र हैं। वे समाज को दिशा देनेवाली विचार-श्रृंखला को बनाते और बढ़ाते हैं। जो समाज बुद्धिजीवियों को मुक्त माहौल नहीं दे पाता, वह पथ-भ्रष्ट हो जाता है।और भीऔर भी

व्यक्ति की नैतिकता हो सकती है। लेकिन सरकारों की कोई नैतिकता नहीं होती। सत्ता की चंडाल चौकड़ी को बचाना ही उसका चरित्र है। हां, वह अवाम की निगाह में जरूर नैतिक दिखना चाहती है।और भीऔर भी

योग की साधना जीवन से हटकर नहीं की जा सकती। हमें योग का अभ्यास जीवन से मुक्ति पाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को पूर्णता से जीने के लिए करना चाहिए। गीता तक में यही बात कही गई है।और भीऔर भी

हमारे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा, इस पर हम अक्सर दूसरों की राय पर चलते हैं जिससे भ्रांति ही उत्पन्न होती है। हमें अपना फैसला खुद करना होगा। तभी हम सही काम को सही ढंग से कर पाएंगे।और भीऔर भी

योग महज कसरत नहीं, बल्कि कर्म में कुशलता का नाम है। हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग इसलिए व्यर्थ चला जाता है क्योंकि या तो हम गलत काम करते हैं या फिर सही काम को गलत ढंग से करते हैं।और भीऔर भी