कहां का अगला जन्म!
न सीखने की कोई उम्र होती है और न ही गलतियों को दुरुस्त करने के लिए अगले जन्म की जरूरत होती है। जो कहते हैं कि अगले जन्म ये गलती नहीं करेंगे, वे बस अपनी चमड़ी बचा रहे होते हैं।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
न सीखने की कोई उम्र होती है और न ही गलतियों को दुरुस्त करने के लिए अगले जन्म की जरूरत होती है। जो कहते हैं कि अगले जन्म ये गलती नहीं करेंगे, वे बस अपनी चमड़ी बचा रहे होते हैं।और भीऔर भी
समय हर जड़त्व से मुक्त कछुआ है। लेकिन हम जड़त्व से ऐसे घिरे हैं कि यथास्थिति नया कुछ करने से रोकती है। सोते-जागते खरगोश की तरह बढ़ते हैं हम। ठान लें तो समय से आगे निकल जाएं।और भीऔर भी
शिव है तो शक्ति है। धरती है तो गुरुत्वाकर्षण है। शरीर है तो मन है। मन को निर्मल रखना है तो पहले शरीर को सहज व शुद्ध रखना जरूरी है। बाद में मन भी शरीर को साधने में मदद करता है।और भीऔर भी
हर कोई भविष्य जानता चाहता है, उसकी झलक पाना चाहता है। लेकिन जब हम समय के साथ वाकई वहां पहुंच जाते हैं, तब पता चलता है कि हम उसके बारे में कितना ऊटपटांग सोचते थे।और भीऔर भी
अपनों में शायद ही कोई अपना मिले, जिसके नाम खुद को किया जा सके। परायों में तलाशोगे, दर-दर भटकोगे तो जरूर कोई न कोई मिल जाएगा, खुद को जिसके नाम कर निश्चिंत हो सकते हो।और भीऔर भी
दार्शनिक बंधु सदियों से इसी तर्क में उलझे हैं कि पहले अंडा आया कि मुर्गी। लेकिन विज्ञान बताता है कि पहले आया आरएनए – राइबो न्यूक्लीक एसिड जो एक साथ मुर्गी भी है और अंडा भी।और भीऔर भी
हर कोई सिर नीचे गाढ़कर चरे जा रहा है। जाल-जंजाल इतने कि जानी-पहचानी चीजों के अलावा और कुछ जानने की फुरसत नहीं। ऐसे में काम की चीज भी लोगों को भोंपू बजाकर सुनानी पड़ती है।और भीऔर भी
जिसे हम देख-समझ नहीं पाते, उसे अज्ञात कह देते हैं। लेकिन समूची सृष्टि में कुछ भी अकारण नहीं है। हां, यह जरूर है कि हाथी अपनी पीठ नहीं देख सकता। उसी तरह हमारी भी निजी सीमाएं हैं।और भीऔर भी
जब आप खास होते हो तो लोग आपको देखते हैं। लेकिन जब आम होते हो तो आप सबको देखते हो। इसलिए जिन्हें भी दुनिया को सही से देखना-समझना है, उनके लिए आम बने रहना ही ज्यादा अच्छा।और भीऔर भी
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