बाकी सब भौकाल!
बड़ा ओहदा, बड़ी कुर्सी, बड़ा नेटवर्क। लेकिन असल में आप कितने बड़े हैं, यह इससे तय होता है कि आपको नितांत अपनों से कैसी आत्मीयता व सम्मान मिलता है। वही आपकी थाती है। बाकी सब भौकाल है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
बड़ा ओहदा, बड़ी कुर्सी, बड़ा नेटवर्क। लेकिन असल में आप कितने बड़े हैं, यह इससे तय होता है कि आपको नितांत अपनों से कैसी आत्मीयता व सम्मान मिलता है। वही आपकी थाती है। बाकी सब भौकाल है।और भीऔर भी
एक दिन में महल नहीं बनते। एक दिन में क्रांतियां नहीं होतीं। एक दिन में कोई ज्ञानवंत नहीं बनता। एक दिन में जितना मिला, वही अपना है। जो छूट गया, उसे फिर पकड़ लेंगे। उसको लेकर पछताना क्या?और भीऔर भी
जो मनोरंजन हमारी पशु-वृत्तियों को पोसता है, वो कभी हमें आगे नहीं ले जा सकता। सार्थक मनोरंजन वही है जो बतौर इंसान हमें ज्यादा संवेदनशील बनाए, एकाकीपन से निकालकर ज्यादा सामाजिक बनाए।और भीऔर भी
जो चीज सालों से नहीं बदली, उसे बदलने का सुख ही सृजनात्कता का सुख है। बदलने की ललक हो, जीवट हो तो अंदर से ऊर्जा के बुलबुले उठते हैं। ये बुलबुले खुशी की चहक व ताजगी साथ लेकर आते हैं।और भीऔर भी
सर पर किसी का साया रहे तो जमकर उछल-कूद मचाई जा सकती है। मां-बाप के साये में बच्चा यूं ही बढ़ता है। लेकिन पौधे को छाया में रखते ही उसके सारे पत्ते धीरे-धीरे गिर जाते हैं और वो सूख जाता है।और भीऔर भी
हर तरफ बुरा ही बुरा है। सब कुछ टेढा-मेढा है। यह सोच-सोच कर रोने का कोई अंत नहीं है। देखना और सोचना यह चाहिए कि जो बुरा है, वो वैसा क्यों है। यह सिरा पकड़ कर ही हम उसे अच्छा कर सकते हैं।और भीऔर भी
जब तक आप कच्चे हो तब तक लेते ज्यादा और देते कम हो। परिपक्व होने जाने पर आप देते ज्यादा और लेते कम हो। लेकिन परिपक्वता ठहरनी नहीं चाहिए क्योंकि रुकने से आप रूढ़ और बेकार हो जाते हो।और भीऔर भी
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