दुनिया का तानाबाना
कोटरों में दाने बीनती दुनिया। व्यक्ति की निजी दुनिया। व्यक्तियों से समाज, समाजों से देश और देशों से बनी दुनिया। हर किसी को मुकम्मल जहां मिल जाता तो इस तरह नहीं बनती दुनिया।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
कोटरों में दाने बीनती दुनिया। व्यक्ति की निजी दुनिया। व्यक्तियों से समाज, समाजों से देश और देशों से बनी दुनिया। हर किसी को मुकम्मल जहां मिल जाता तो इस तरह नहीं बनती दुनिया।और भीऔर भी
इंसान का स्वभाव और कुत्ते की दुम एक बार आकार ले ले तो फिर उसे बदलना लगभग नामुमकिन होता है। इसलिए बालपन में ही अच्छे संस्कारों की नींव डालना जरूरी है। बाद में कुछ नहीं हो पाता।और भीऔर भी
दूर से ढोल के बोल ही नहीं, लोग भी बड़े सुहाने लगते हैं। पास आने पर पता चलता है कि सुहानी सूरत के पीछे कितना विद्रूप छिपा है। इसीलिए कहते हैं कि इंसान की सूरत नहीं, सीरत पर जाना चाहिए।और भीऔर भी
पशु वृत्तियां हम पर उसी हालत में हावी होती हैं जब हम सामाजिक कम और एकाकी ज्यादा होते हैं। इसलिए अपने अंदर के पशु को इंसान बनाना है तो हमें ज्यादा से ज्यादा सामाजिक होना पड़ेगा।और भीऔर भी
पार्टी, परिवार या संगठन में एक के पीछे जीरो लगाने से कुछ नहीं होता। एक और एक मिलकर ग्यारह भी नहीं बनता। हर किसी को अपने दांते घिसने पड़ते हैं। तब जाकर वह मशीन में फिट बैठता है।और भीऔर भी
अच्छे विचार मेहमान सरीखे होते हैं। आए, रहे और चले गए। उन्हें अपनाना और अपनी सोच का हिस्सा बनाना आसान नहीं। बहुत सारी रगड़-धगड़ के बाद ही ये मेहमान घर के सदस्य बन पाते हैं।और भीऔर भी
मन में आए भाव-विचार के माफिक शरीर रसायन बनाता है और शरीर में पहुंचे रसायन मन को घुमा डालते हैं। फिर, रसायन तो रक्त के साथ पोर-पोर तक जाता है तो मन भी हर पोर तक पहुंच जाता होगा!और भीऔर भी
हम सब रहते तो एक आकाश के नीचे हैं। लेकिन सबका क्षितिज एक नहीं होता। कोई कहीं तक देख पाता है तो कोई कहीं तक। हम चाहें तो अध्ययन, चिंतन व मनन से अपना क्षितिज बढ़ा सकते हैं।और भीऔर भी
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