बच्चा जन्म के कुछ दिन तक चीजों को उल्टा देखता है क्योंकि आंखें रेटिना पर उल्टी ही छवि बनाती हैं। फिर दिमाग सब कुछ सीधा दिखाने लगता है। कहीं जो हमें दिखता है, सच उसका उल्टा तो नहीं!!और भीऔर भी

बुद्धि के बिना हम क्षितिज के पार नहीं देख सकते। इसीलिए हमारी याददाश्त भी बड़ी कमजोर होती है। इसका फायदा दुष्ट लोग उठाते हैं। वे बार-बार संत का भेष बनाकर आते हैं और हमें लूटकर चले जाते हैं।और भीऔर भी

हमें अपने पूर्वजों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों का नहीं, उनके जुझारूपन का कायल होना चाहिए। जब खुद वे शाश्वत नहीं रहे तो उनके निष्कर्ष कैसे शाश्वत हो सकते हैं। हां, उनका जुझारूपन जरूर शाश्वत है।और भीऔर भी

जब चील गुरुत्वाकर्षण को तोड़ दूर गगन से धरती का निरीक्षण कर सकती है, इंसान जब हज़ारों मील ऊपर जहाज उड़ा सकता है, तब हम अपने अहम व पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सच को क्यों नहीं देख सकते।और भीऔर भी

हम में से ज्यादातर लोग जिंदगी भर बच्चे बने रहते हैं तो अभिभावक कैसे बन पाएंगे! जब तक बड़े होते है तब तक बच्चे भी बड़े हो चुके होते हैं तो पीढ़ियों के नाम पर आपस की ही होड़ शुरू हो जाती है।और भीऔर भी

अंश-अंश में सब सही। पर संपूर्ण आते ही भ्रम में पड़ जाते हैं कि आखिर कौन है सही, क्या है सही? बीच में झूलेंगे तो हमेशा भ्रमित रहेंगे, जबकि कोई पाल्हा पकड़ लेंगे तो सारा भ्रम भूत की तरह भाग जाएगा।और भीऔर भी

मैं किसी के पास पूछने नहीं गया कि उसे क्या चाहिए। मैं अपने में डूबा तो डूबता ही चला गया और गहरी डुबकी के बाद जो निकाल कर लाया तो सभी जोर-जोर से कहने लगे – अरे यही तो हमें चाहिए था।और भीऔर भी

अंदर या बाहर, कहीं से जड़ता से निकलने का मतलब है एक चुम्बकीय क्षेत्र को तोड़ना। इसके लिए या तो निरतंर घर्षण से नया चुम्बक पैदा करना पड़ता है, नहीं तो कोई बड़ा चुम्बक खींचकर लाना पड़ता है।और भीऔर भी

व्यक्ति पर प्रभाव बाहर के होते हैं, असर अंदर से होता है। लेकिन व्यक्तियों से बने समाज में खामी संरचनागत होती है। इसलिए व्यक्ति व समाज की समस्याओं का निदान कभी एक जैसा नहीं होता।और भीऔर भी

हम अपने में इस कदर डूबे रहते हैं कि बाढ़ का पानी किस कदर करीब आ पहुंचा है, पता ही नहीं चलता। जब हम ठीक डूबने की कगार पर होते हैं, तब जागते हैं। लेकिन तब तक तो काफी देर हो चुकी होती है।और भीऔर भी