इतने कृपालु क्यों?
दलित के नाम पर आप क्यों सत्ता पाना चाहती हैं बहनजी? जनता के नाम पर आप सरकार में क्यों आना चाहते हैं नेताजी? जनता पर यूं मुफ्त कृपा बरसाने के पीछे की असली नीयत तो खोलिए जनाब!और भीऔर भी
निंदक नियरे राखिए
हमें अपने इर्दगिर्द हमेशा ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो हमारी आंखों में आंखें डालकर सच बोल सकें। खासकर तब, जब हमारे दिन खराब चल रहे हों और हम बार-बार अपने लक्ष्य से चूक रहे हों।और भीऔर भी
चिंता को ठोकर
ऐसी चिंता का क्या फायदा जो किसी समाधान तक आपको न पहुंचा सके? जो आपको भंवरजाल में फंसाकर अनागत के भय के दलदल में डाल दे, वैसी चिंता को ठोकर मारकर आगे निकल जाना चाहिए।और भीऔर भी
कहां के तुर्रमखां!
एक हम ही तुर्रमखां नहीं हैं यह काम करनेवाले। दूसरे भी बहुत-से हैं जो इसी वक्त यह काम बड़ी शिद्दत से कर रहे होंगे। यह सोच एक तो हमारा गुमान तोड़ती है। दूसरे अकेलेपन की घबराहट भी मिटा देती है।और भीऔर भी
बेला भी, गुलाब भी
फूल तो गुलाब भी है और बेला भी। अलग हैं लेकिन एक भी। यह भिन्नता प्रकृति व समाज दोनों में अपरिहार्य है। जो इसे तोड़कर एकसार बनाना चाहते हैं, वे समाज ही नहीं, प्रकृति के भी अपराधी हैं।और भीऔर भी
संघर्ष से पात्रता तक
जब आप एक ध्येय के साथ संघर्ष कर रहे होते हो, तब दरअसल आप अपने अंदर एक पात्रता पैदा कर रहे होते हो। इस पात्रता में इतना दम होता है कि समर्थन खुद ब खुद आपकी तरफ दौड़ा चला आता है।और भीऔर भी
साध्य नहीं, साधन
अंदर की प्रकृति को बाहर की प्रकृति से मिला देना, प्रकृति के साथ एकाकार हो जाना ही लक्ष्य है। सत्ता और समाज अपने-आप में साध्य नहीं, बल्कि साधन हैं प्रकृति की विपुल संपदा में अपना हिस्सा पाने के।और भीऔर भी
समय सापेक्ष
समय के साथ चलो तो चीजें बड़ी स्थिर या धीमी दिखती हैं। कहीं कोई खटका नहीं। सब कुछ सामान्य गति से चलता है। लेकिन समय से पीछे छूट जाओ तो सब कुछ तेज़ी से भागता हुआ नज़र आता है।और भीऔर भी
