मैं तो बांस का एक टुकड़ा भर हूं, जिसने बाहर से आनेवाली हवाओं के लिए कई झरोखे काट रखे हैं। अगर बहती हवा के झोंके, किसी की सांसों का वेग इसे बांसुरी बना देता है तो इसमें मेरी क्या भूमिका!और भीऔर भी

फिरौती, राजनीति, धर्म और धंधा – चारों में पब्लिक से वसूली की जाती है। फिरौती में फौरी तो राजनीति में स्थाई भय दिखाकर वसूली की जाती है, जबकि धर्म और धंधे में वसूली बड़े प्यार से की जाती है।और भीऔर भी

अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी

परिवार के लिए आप यकीनन मूल्यवान हैं। लेकिन अपना सच्चा सामाजिक मूल्य समझना हो तो बस इतना सोचकर देखें कि आपके बिना यह दुनिया कैसे चलती है और आपके न होने से कितना फर्क पड़ेगा।और भीऔर भी

प्रकृति की संरचनाएं जैसी जटिल हैं, वैसी ही जटिलता हमारे भाव-संसार, विचारों की दुनिया और सामाजिक रिश्तों में भी है। जो इसे नहीं देख पाते या नज़रअंदाज़ करते हैं, वे अक्सर ठोकर खाते रहते हैं।और भीऔर भी

जहां गंदगी होती है, क्षरण वहीं होता है। जहां सफाई है, वहां स्वाभाविक विकास चलता रहता है। यही प्रकृति का नियम है। इसलिए विकास के लिए जरूरी शर्त है कि गंदगी को बराबर साफ करते रहा जाए।और भीऔर भी

नित नए-नए प्रेक्षण से पुरानी धारणाएं बदलती ही नहीं, परिष्कृत होती चलती हैं। लेकिन जिसने आंख, कान, नाक बंदकर प्रेक्षण करना ही बंद कर दिया है, वे तो ताज़िंदगी गांधी के तीन बंदर ही बने रहेंगे।और भीऔर भी

लगे रहने से भगवान के सिवा सब कुछ मिल जाता है। भगवान भी इसलिए नहीं क्योंकि उसे खोजते-खोजते तो हम अपनी ही गुप्त गुफाओं में पहुंचकर अपने ही भव्य व विराट स्वरूप के सामने आ खड़े होते हैं।और भीऔर भी

किसी गिरते बूढ़े को उठाकर तो देखो! सड़क पर गिरे पड़े किसी घायल को अस्पताल पहुंचाकर तो देखो! घर से भागे किसी बच्चे को आसरा देकर तो देखो! जानवर से उठकर कभी इंसान बनकर तो देखो!और भीऔर भी

इंसान अपनी मंज़िल से उतना ही दूर है, जितना दूर वो अपने कुतूहल से है। जानने की इच्छा न हो, नए से नया देखने का कौतूहल न हो तो इंसान चलता ही नहीं; और, चले बिना मंजिल भला किसे मिलती है!और भीऔर भी